"वक्त की गोद में"
कभी हाथों में, कभी माथे पर, दिखती थीं जो लकीरों सी। उस किस्मत को मैं अब, वक्त की गोद में छोड़ आया हूं। तांकती रहती थी, घड़ियां जो इंतजार की, सब्र की लाठियों से, उन्हें भी तोड़ आया हूं। आसान सी दिखती थी, चलता था कभी राहों में, उन्हें भी मै उलझे से , जालों में मोड़ आया हूं। बचे थे थोड़े से जो, दिए पथ प्रदर्शक बन। उन्हें भी अब हवाओं के, बीच जैसे छोड़ आया हूं। चमकते थे रातों को, दिखते जो निराले से थे। उन जुगनुओं को भी, मै जैसे उजालों में छोड़ आया हूं। सपने जो पल बैठे थे, भ्रम के बड़े से एक महल में, हकीकत के घन - हथौड़ों से, उस महल को भी मै तोड़ आया हूं। ©® कुन्दन सिंह चौहान।