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"वक्त की गोद में"

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कभी हाथों में, कभी माथे पर, दिखती थीं जो लकीरों सी। उस किस्मत को मैं अब, वक्त की गोद में छोड़ आया हूं। तांकती रहती थी,  घड़ियां जो इंतजार की, सब्र की लाठियों से,  उन्हें भी तोड़ आया हूं। आसान सी दिखती थी, चलता था कभी राहों में, उन्हें भी मै उलझे से , जालों में मोड़ आया हूं। बचे थे थोड़े से जो, दिए पथ प्रदर्शक बन। उन्हें भी अब हवाओं के, बीच जैसे छोड़ आया हूं। चमकते थे रातों को, दिखते जो निराले से थे। उन जुगनुओं को भी, मै जैसे उजालों में छोड़ आया हूं। सपने जो पल बैठे थे, भ्रम के बड़े से एक महल में, हकीकत के घन - हथौड़ों से, उस महल को भी मै तोड़ आया हूं।     ©® कुन्दन सिंह चौहान।

लंबी कानूनी जंग के बाद, आखिरकार निर्भया को मिला इंसाफ।

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देश की राजधानी दिल्ली में 16 दिसंबर 2012 की वह काली रात जब कुछ दरिंदों ने देश की बेटी निर्भया को न केवल अपना शिकार बनाया, बल्कि हैवानियत की सारी सीमाएं भी लांघ दी थी। और फिर निर्भया जिंदगी की जंग भी हार गई थी, उस घटना ने जैसे सिर्फ दिल्ली में नहीं बल्कि पूरे भारत में उबाल ला दिया था।पूरा भारत इंसाफ के लिए सड़कों पर आ गया था। निर्भया देश की बेटी बन गई थी। देश का हर नागरिक निर्भया के लिए न्याय मांगता नजर आ रहा था। संसद से लेकर सड़क तक उस दौर में जोरदार हंगामे हुए। तब  केंद्र में रही यूपीए सरकार पर जबरदस्त दवाब बना। तत्कालीन गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने देश को आश्वासन दिया था, कि त्वरित कार्रवाई कर निर्भया को जल्द से जल्द न्याय दिया जाएगा। मामले के कोर्ट में पहुंचने के बाद 6 आरोपियों में से एक राम सिंह( बस चालक) ने मार्च 2013 को तिहाड़ जेल में आत्म हत्या कर दी। बचे पांच आरोपियों में से एक आरोपी नाबालिक था, जिसे 3 वर्ष के लिए बाल सुधार गृह भेज गया। उस नाबालिक लड़के की सजा पर भी आज तक विरोध होता आया है। और विरोध भी जायज है। इस तरीके के जघन्य कृत्य को अंजाम देने वाला दरिंद...

आप आंखें मूंदे बैठे रहें "सरकार" ।

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चुनावों में राजनीतिक दलों के झंडे उठाते बेरोजगार, चुनावों के बाद पूरे पांच साल उनकी अनदेखी, उनसे जुड़े मुद्दों पर सरकार की असंवेदनशीलता उत्तराखंड में आम हो चला है। बेरोजगार युवाओं की इतनी तादाद कि किसी भी सरकार के खिलाफ बिगुल फूंक दें, तो चुनावों में उसका हारना तय समझो। मगर उसके बावजूद भी सरकार की उनके प्रति इतनी हठधर्मिता समझ से परे है। अभी हाल ही में वन आरक्षी की परीक्षा सम्पन्न हुई। मुश्किल से रोजगार के लिए पद निकले थे। 1200 के करीब पदों के लिए डेढ़ लाख के करीब बेरोजगार युवाओं ने इसके लिए आवेदन किया था। पूरे तीन वर्ष बाद जैसे तैसे सरकार लिखित परीक्षा करा पाई। और जैसा शक था, हुआ वैसा ही। परीक्षा में बड़े पैमाने पर धांधली की खबरें आने लगी। कहीं ओएमआर सीट वायरल हुई, कहीं नकल कराने वाले गिरोह का सरगना पकड़ा गया। युवाओं में संदेह पैदा करने के लिए ये दो मामले ही काफी थे। और हो भी क्यों नहीं? आखिर युवा इतने दिनों की मेहनत और सब्र के बाद इस परीक्षा में बैठे थे। लेकिन फिर शुरू हुआ सरकार की इस मामले में लीपापोती का सिलसिला, जो ना सिर्फ नाटकीय था, बल्कि इतना हास्यास्पद कि युवाओं के जख्मों पर ...

रिजॉर्ट्स में कैद भारतीय लोकतंत्र।

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तो चलिए हम विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश होने पर खुद पर गर्व करे। चलिए दंभ भरें कि हमारा संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है। इतना बड़ा लोकतंत्र, इतना लंबा संविधान कि, अब उस संविधान की दुहाई देकर, सबसे बड़े लोकतंत्र में चुने जाने वाले माननीय विधानसभाओं में नहीं, बल्कि होटलों और रिसोर्टोस में खुद को कैद पाकर राहत महसूस कर रहें हैं। भारतीय लोकतंत्र की सारी मर्यादाओं का जनाजा निकलते हुए देखकर, विचारधाराओं में, पार्टियों में बंटी जनता भी अपने अपने हिसाब से खुश नजर आ रही है। इस पार्टी के साथ इतने, दूसरी पार्टी के साथ इतने! इसी चर्चा में हमारा महान लोकतंत्र सिमट कर रह गया है। कोई बेंगलुरु में कैद होकर सिंधिया सिंधिया कर रहा है,, तो कोई हरियाणा और कोई राजस्थान में अपने अपने आकाओं के प्रति प्रतिबद्धता जता रहे हैैं। जनता की चिंता किसे है? जनता का अधिकार तो सिर्फ मत देने तक ही सीमित कर दिया गया है। शुक्र है संविधान की 10वीं अनुसूची में शामिल "दल - बदल कानून" ( 52 वा संविधान संशोधन) 1985 में लाया गया, जिससे कुछ हद तक कुर्सी के इस खेल में नेताओं के चुनाव जीतने के बाद दूसरे...