चल! लौट अपने आशियाने में।....
परिंदों की हवाओं से.. ये बेफिक्र सी, ये आवारगी भरी दोस्ती, ख़ुद में ढूंढ, किससे है? कहां है? निशा का अंधियारे से.. ये निश्छल सा, ये उन्मुक्त सा प्रेम, खुद में ढूंढ, किससे है? कहां है? दुनियादारी की बेड़ियों में, दिन भर जकड़े रहना, यहीं तेरी नियति है। चल लौट! अपने आशियाने में।। ©® कुन्दन सिंह चौहान।