हां। मै मौन हूं...
वसुधा की छत, और छत की मुंडेर पर, शांत सा, सहमा सा, बैठा ये कौन है? दर्द पर भी, ना कोई कराहट चुभते सुलों पर भी, वेदना भरी ही सही, मगर मुस्कुराहट। वक्त के आगोश में, जैसे जबरन, बैठा ये कौन है? जीत या हार पर, हर कठिन से वार पर, दिखता है बस एक मुख। सहजता से सह ले जैसे, वक्ष पर भी शिलिमुख। सुविज्ञ है हर प्रश्न का, मगर फिर भी निरुत्तर, बैठा ये कौन है? सुन ! कर रहा हूं प्रतीक्षा, बस शब्दों से मैं दीन हूं। काल की कोठरी तो देख, अनागत यज्ञ में लीन हूं। युक्ति संगत हर प्रश्न के, योग्य उत्तर जो दे सकूं। यहीं प्रयोजन हूं रुका... हां। मै मौन हूं... मै मौन हूं.. मै मौन हूं। ©® कुन्दन सिंह चौहान।