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हां। मै मौन हूं...

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वसुधा की छत, और छत की मुंडेर पर, शांत सा, सहमा सा, बैठा ये कौन है? दर्द पर भी, ना कोई कराहट चुभते सुलों पर भी, वेदना भरी ही सही, मगर मुस्कुराहट। वक्त के आगोश में, जैसे जबरन,  बैठा ये कौन है? जीत या हार पर, हर कठिन से वार पर, दिखता है बस एक मुख। सहजता से सह ले जैसे, वक्ष पर भी शिलिमुख। सुविज्ञ है हर प्रश्न का, मगर फिर भी निरुत्तर, बैठा ये कौन है? सुन !  कर रहा हूं प्रतीक्षा, बस शब्दों से मैं दीन हूं। काल की कोठरी तो देख, अनागत यज्ञ में लीन हूं। युक्ति संगत हर प्रश्न के, योग्य उत्तर जो दे सकूं। यहीं प्रयोजन हूं रुका... हां।  मै मौन हूं...       मै मौन हूं..       मै मौन हूं। ©® कुन्दन सिंह चौहान।                   

पृथक - उत्तराखंड राज्य, अब कहां तुम हो?..

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पृथक - उत्तराखंड राज्य, अब कहां तुम हो? _________________________________ सही यातनाएं, खाई लाठी, भूखे - प्यासे, खाई गोली छाती। लो अब मिला राज्य, ये क्या - बिना राजधानी? देहरादून अस्थाई थोपी, जनता ने थी गैरसैंण ठानी। जन भावनाओं की , सरकार थी बननी। नेताओं की कारगुज़ारी देखो, अलग थी इनकी कथनी - करनी। राजधानी पर सिर्फ आयोग बनाए,  पहाड़ को बस छलते आए, और गैरसैंण ! ये वोट बैंक की पोथी बन गई, फिर ग्रीष्म - शीत का झुनझुना लाए। पीड़ा कैसे ये महसूस करेंगे? दरबारों से ही ये दुःख दर्द नापें। असुविधाओं के भी पहाड़ बना गए, जनता को बस वोटों से हांके। स्वास्थ्य, शिक्षा का रसूख भी देखा, हल्द्वानी और बस दून खड़ी हैं। पहाड़ों में सिर्फ नाम सुनो तुम, जहां भी हैं, बेसुध पड़ी हैं। दंश पलायन का तो, झेल ही रहे थे। बेरोजगारी के भी, आयाम नए हैं। इन्हीं मुद्दों पर तो, अलग राज्य दिया था, सत्ता लोलुपता नेताओं की, सब मुद्दों को ये मोड़ गए हैं। मानो धरती पर ये स्वर्ग बसा है, इतना सुंदर राज्य कहां है? बद्री - केदार धाम विराजे, गंगा - यमुना के उद्गम जहां हैं। माना की 20 वर्ष बीत गए, अब तो हुक्मरानों आं...

निष्पक्षता : तेरे कातिल हम।

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वैचारिक कट्टरता के खंजर को, सबने उसकी पीठ पर घोपा। घायल रहा बेचारा दिनों तक, दोगलेपन की जमीं को सौंपा। रह गई थी कुछ जो सांसे बाकी, सब राजनीति ने सोख ली जैसे। जीते - जी उसे दफनाने को, सबने ताकत झोंक ली जैसे। उसके कत्ल के खून से लथपथ, सबके ही तो हाथ सने हैं। राजनीति का भूत सवार है, बदले के बस बाण तने हैं। उन्मादी बनकर बैठ गया जब, तथाकथित चौथा स्तम्भ भी। बड़े लोकतांत्रिक देश का तमगा, अब तो चूर हुआ ये दंभ भी। संवैधानिक पद भी कहां अछूते? नेताओं की मन की बोले। संविधान - न्याय का तराजू गायब, तटस्थता से कौन अब तौले? विवेकशीलता बची कहां है? "निष्पक्षता" - ये क्या बला है? इशारों पर नृत्य चल रहा है, भ्रष्ट राजनीति की यहीं कला है। नैतिकता को नोक पर रखकर, कट्टरता पहले, मानव हम तब हैं। हो - हल्ला , अब कोलाहल क्यों है? इसके कातिल हम सब हैं। ©® कुन्दन सिंह चौहान।