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भला ऐसे भी क्यों मरूं मैं? ...

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भऊंरे के भय से कभी, पुष्प नहीं खिलता है क्या? मधुर सुगंधित रस चूसता, विचलित पुष्प होता है क्या? संघर्षों ने तो,  हमें पाला है। हादसों ने हमें,  संभाला है। फिर क्षणिक दुःख दर्दों से, क्यों डरूं मैं? तप्ती भट्टी में,  जैसे मिट्टी हो, ऐसे वक्त ने हमें,  ढाला है। चला जब भी मंजिल पाने, राहों ने ही बदला, पाला है। फिर पूर्व नियत भाग्य से; क्यों लडूं मैं? हर मुश्किल तो,  गले लगाए हैं, वक्त ने भी जैसे, प्रतिद्वंदी समझ।  हर किस्म के, बाण चलाएं हैं। फिर हर वक्त अनुबंधन, क्यों करूं मैं?  चुभते सूलों से, भला क्यों डरूं मैं? बाधाओं की जो, दीवारें पर्वत सी, हर दीवार को, लांघते आए हैं। ऋतुओं के संग, तरू को छोड़े, भला पल्लव सा भी, क्यों झड़ू मैं? संघर्षों को ही, राह बनाऊं, निराधार सा,  जी गए बस; भला ऐसे भी, क्यों मरूं मै? ©® कुन्दन सिंह चौहान।

मैं भी उत्तरायण का इंतजार कर रही हूं ...

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मुझे खुद का परिचय देने की आज आवश्यकता महसूस हो रही है। मैं उस देश की "शिक्षा व्यवस्था" हूं, जिस देश को कभी "जगतगुरु" के नाम से संबोधित किया जाता था। ज्ञान के दीपक का प्रज्वलन भी मेरे भारत से ही माना जाता है। पूरे विश्व में ऐसी छाप कि, इकबाल भी लिख बैठे - कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। सदियों रहा है दुश्मन, दौर - ए - जहां हमारा।। मगर आज जितना दुख मुझे अपने नसीब पर होता है, उससे कई ज्यादा तरस मुझे मानव द्वारा बनाए गए उन नए उद्देश्यों पर आता है, जो नैतिकता के पथ को तो भूल ही चुके हैं, वरन "नैतिकता" शब्द ही मानव सभ्यता की जीवन शैली से धकेल कर बाहर कर चुके हैं। और उन उद्देश्यों की प्राप्ति मात्र ही मेरी छवि को धूमिल करने के लिए काफी थी। व्यक्तित्व विकास के मेरे मूल सिद्धान्त की तौहीन तो की ही गई, बल्कि निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए मुझे जैसे निर्वस्त्र भी कर दिया गया। मेरे बिना मानव और जानवर दोनों समान ही होते हैं। मै ही मानव को उसकी पहचान दिलाती हूं।अफसोस की आज मेरा लक्ष्य निर्धारित नहीं है। और इसके बिना मेरे मार्ग में भटकाव बहुत ही सहज है...

कंडाली की झपाक और झरझराहट.....

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आज भी जब इस कंडाली के पौधे को तस्वीर में देखता हूं तो अंदर से एक झरझारहट सी उत्पन्न हो जाती है। तो सोचिए अगर असली में ये पौधा हमारे नजदीक हो, तो क्या हाल होगा। यह कहानी सिर्फ मेरी नहीं, बल्कि हर उस पहाड़ी की होगी, जिसे बचपन से ही इस कंडाली के नाम से डराया जाता था। और बच्चों को कंडाली से डराने का यह सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है। सबसे पहले कंडाली के पौधे से जुड़े कुछ तथ्यों पर नजर डालते हैं। यह पौधा जिसे अंग्रेजी में "नेटल" के नाम से जाना जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम "URTICA DIOICA" है। यह अर्टिकाकेई वनस्पति फैमिली का होता है। इसका वास्तविक नाम अर्टिका पर्वीफ्लोरा है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो इस पौधे का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। शरीर में पित दोष और शरीर की गर्मी को दूर करने के लिए भी इसका उपयोग किया जाता है। हमारे पहाड़ में इसका एक और जगह उपयोग किया जाता है। पावों में मोच आ जाने पर भी उस जगह कंडाली की झपाक लगा कर उसे ठीक किया जाता है।  यह पौधा मध्य हिमालय वाले क्षेत्रों एवम नेपाल आदि में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। उत्तराखंड में भी यह पौधा लगभग...

पूछना था प्रकृति से...

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वृक्ष अपनी आड़ में, प्रदान करते हैं शीतलता। पूछना था वृक्षों से! भरी दोपहरी की तपिश को, कैसे सहते होंगे वो? दिए तले तिमिरता, प्रकाशमय करता चहुं ओर। पूछना था दियों से; अन्धकार तले खुद रहकर भी, कैसे जलते होंगे वो?  पीती नहीं कभी खुद को, बुझाती पिपासा धरा की। पूछना था उन नदियों से; इतना निस्वार्थ भाव संजोए, कैसे बहती होंगी वो? प्रतिदिन जगाता जग को, भूलवश भी भूल ना करता। हम मानव क्या देते उसको, कण - कण में जो उजियारा भरता। पूछना था उस दिनकर से भी, कैसे अडिग रहता है वो? प्राणनाथ बने हर प्राणी के, उन्मुक्त सा अहसास कराते। मानव ने तो कब कसर है छोड़ी,  कुकृत्यों से रोज जहर भराते। अपने ही जब दुश्मन बन बैठे, पूछना था हवाओं से भी, फिर कैसे चलती होंगी वो? प्रकृति पालती - पोषती हमें, हम रौब जमाते उस पर। वो संरक्षण देती गोद में अपनी, हम रोष जताते उस पर। वो हजारों अदृश्य त्याग है करती, हम अहसान जताते उस पर। इतना सब कुछ सहती है; फिर भी सबको आश्रय देती। पूछना था प्रकृति से भी, मां रूपी ममतामयी हृदय; फिर कैसे रखती होगी वो?     ©®कुंदन सिंह चौहान।