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भीख मांगता निर्बल इंसान।

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सांसारिक सुखों के मोह में, कितना विनाशकारी हो सकता है दुरूपयोग; ईश्वर द्वारा प्रदत्त शक्तियों का। भूल गया था, अबोध इंसान।। भौतिकवाद के पथ पर, कभी मुड़कर भी देखना नहीं चाहता था पीछे; कि कितना खोखला, कर चुका हूं अपने अस्तितव की जड़ों को; इतनी दूर पहुंच चुका था, दंभी इंसान।। हर वक्त सुख संसाधनों की  बाट जोहता था, धन दौलत से खेलता हर पल; मानवता की पोल खोलता था। सूर्य , वायु और  नीर की निस्वार्थता को ताक पर रखकर; स्वार्थी सा बन गया था, अवगुणी इंसान।। प्रौद्योगिकी की  बेमतलब की प्रतिस्पर्धा में, बना चुका था खुद को; आत्मघाती विस्फोटक की तरह। सुखा कर कंठ धरती का जैसे, बना चुका था बेतहाशा प्यासा; धरती के वक्ष को करता आ रहा था छत - विछत, खुद ही कब्र अपनी खोद चुका था, अज्ञानी इंसान।। अब डरा, सहमा हुआ सा, दुबका हुआ है घरों में; धन दौलत, सुख संसाधन, तथाकथित आधुनिकता, सब कुछ दांव पर लगाकर, बन बैठा है फकीर । बस मांग रहा है प्रकृति से; खुद की सलामती की भीख, निर्बल इंसान।। ©® कुन्दन सिंह चौहान 

"कोरोना" की जंग को कमजोर करता जानलेवा "तब्लीगी जमात" ।

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जहां पूरा विश्व इन दिनों कोरोना जैसी महामारी से जूझ रहा है। वहीं भारत भी मजबूती से संघर्ष कर इस लड़ाई को लड़ रहा है। लेकिन अचानक भारत में "तब्लीगी जमात" जैसे संघटन ने इस लड़ाई को कमजोर करने की कोशिश की है। जो ना केवल पूरे भारत के लिए एक परेशानी का सबब बन गया है, बल्कि इस जानलेवा वायरस से मजबूती से लड़ रहे पूरे देशवासियों के सामने एक चुनौती भी खड़ी कर चुका है। सर्वप्रथम इस विवादित "तब्लीगी जमात" के इतिहास पर नजर दौड़ाएं , तो यह संघटन एक तरीके से पूरे विश्व में "सुन्नी इस्लामी धर्म" के प्रचार एवम प्रसार के लिए खड़ा किया गया अंदोलन माना जाता है। गौरतलब बात यह है कि इस तब्लीगी जमात का जन्म भारत में ही सन 1926-27 के दौरान हुआ था।  इसकी नीव मौलाना मुहम्मद इलियास ने रखी थी। माना जाता है कि इसी मौलाना मुहम्मद इलियास द्वारा लोगों को इस्लामी शिक्षा देने के उद्देश्य से दिल्ली से लगे हुए शहर "मेवात" में इस कार्य को शुरू किया था। बाद में उन्होंने इस आंदोलन का विस्तार कर न सिर्फ सम्पूर्ण भारत में इसे फैलाया, बल्कि पूरे विश्व में भी इस आंदोलन को खड़...

घड़ा भरें, फिर खुद ही फोडें!

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निश्चल बहता नीर पवित्र जो, आओ उसकी हम धारा मोड़ें! उपवन जो आभूषण धरती के, आओ क्रूर बन उनको काटे - तोड़ें! संस्कृति - सभ्यताओं का गला रेंत कर, आओ हम बस संसाधन जोड़ें! मानवता का पथ भ्रष्ट करें हम, आओ करुणा, भाव दया भी छोड़ें। परस्पर धर्मों में बंट जाते हैं, आओ लड़ने का रस्ता खोलें! सच्चाई की भी परिभाषा बदलें, आओ जोरों से झूठ हम बोलें! चरित्र , समर्पण भाव नकारें। आओ धन दौलत से काबिलियत तौलें! पड़ें रहें निर्जीवों की श्रेणी में, आओ धरती का लहू निचोडें! इंसानियत की निर्मम हत्या कर, आओ जात - पात का चोला ओढ़ें! चलो अंबार लगाएं पापों का, आओ घड़ा भरें, फिर खुद ही फोड़ें!     ©® कुन्दन सिंह चौहान।