भीख मांगता निर्बल इंसान।
सांसारिक सुखों के मोह में, कितना विनाशकारी हो सकता है दुरूपयोग; ईश्वर द्वारा प्रदत्त शक्तियों का। भूल गया था, अबोध इंसान।। भौतिकवाद के पथ पर, कभी मुड़कर भी देखना नहीं चाहता था पीछे; कि कितना खोखला, कर चुका हूं अपने अस्तितव की जड़ों को; इतनी दूर पहुंच चुका था, दंभी इंसान।। हर वक्त सुख संसाधनों की बाट जोहता था, धन दौलत से खेलता हर पल; मानवता की पोल खोलता था। सूर्य , वायु और नीर की निस्वार्थता को ताक पर रखकर; स्वार्थी सा बन गया था, अवगुणी इंसान।। प्रौद्योगिकी की बेमतलब की प्रतिस्पर्धा में, बना चुका था खुद को; आत्मघाती विस्फोटक की तरह। सुखा कर कंठ धरती का जैसे, बना चुका था बेतहाशा प्यासा; धरती के वक्ष को करता आ रहा था छत - विछत, खुद ही कब्र अपनी खोद चुका था, अज्ञानी इंसान।। अब डरा, सहमा हुआ सा, दुबका हुआ है घरों में; धन दौलत, सुख संसाधन, तथाकथित आधुनिकता, सब कुछ दांव पर लगाकर, बन बैठा है फकीर । बस मांग रहा है प्रकृति से; खुद की सलामती की भीख, निर्बल इंसान।। ©® कुन्दन सिंह चौहान