संदेश

मई, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

जीवन का बसंत अनिश्चित...

चित्र
बसंत में खिलखिलाते , पुष्पों की रौनक देख.. भंवरे भी अनायास ही झूम उठते हैं। मंडराते हैं सुबह –शाम, और  जीवन भर की दौलत उनकी.. बड़े चाव से लूटते हैं। पुष्प बेचारा.. सुगंध है, खुबसूरती है.. मगर असहाय बना बैठा है। पूछता है प्रश्न मानो वो, कि.. ऐसी भी क्या लाचारी है? महज कुछ ही दिन हैं, जो शेष बचे हैं.. भंवरों को भी चेताता है। आखिर कब तक मैं खिला रहूंगा? कब तक तुम मंडराओगे? जीवन का बसंत अनिश्चित, निश्चित है बस झड़ने का दिन। – कुन्दन चौहान |  कुन्दनकृति

चांद भी हर रोज जगाता रहा...

चित्र
जिंदगी भर.. शराफत की  दुकान चलाता रहा। खरीददार  कांटों के थे.. मैं फूल सजाता रहा। दूरियां चाहते थे.. सफर में जो लोग, नजदीकियां उन्हीं से  मैं बनाता रहा। हर आसान खेल... जो जीतने थे मुझे, उनको भी तस्सली से मै हारता रहा। यूं तो सूरज ही जगाता है हर रोज मगर.. चांद भी हर रात, मुझे जगाता रहा। ❤️🌸 – कुन्दन चौहान |  कुन्दनकृति

मौन...

चित्र
भावनाएं, जिनका गला घोटा जा रहा था रोज। एक रोज दम तोड़ गईं, और फिर निकला जनाजा। शब्दों की भीड़ उमड़ी, कांधा देने के लिए धक्मधक्का। मगर संवेदनाओं के होंठ, सिले हुए थे हर शब्द के। अंतिम यात्रा बढ़ते जा रही थी, फिर आ गई एक त्रिवेणी, जहां संगम था, बेबसी, मजबूरी और अभागी नदियों का। लकड़ियां इकट्ठा की गई, समझौते के पेड़ की, सब तैयारियां पूरी थी, चिता पर रख दी गई भावनाएं, मगर मुखाग्नि कौन देगा? कौन अपना है इन भावनाओं का यहां? शब्द तांक रहे थे मौन की ओर, और मौन फिर से करने लगा, भावनाओं का दाह संस्कार।  – कुन्दन चौहान  |  कुन्दनकृति

स्वार्थ जड़ों का...?

चित्र
अंकुर इठलाता हुआ, निहारने लगा धरती को। बड़ा हुआ, पौधे से पेड़ बना, शाखें पसारी चारों ओर, पत्तियां, कोंपले, फूल, फल..  सारा यौवन पा लिया; अब अकारण दंभ भी,  महसूस कर रहा था। जितनी ऊंचाई पा रहा था, उतना ही दूर जा रहा था, अपनी बुनियाद से। इधर जड़ें, जो कभी नहीं देख पाई, अपना यौवन। क्या किसी और का भी, होगा ऐसा अधोमुखी जीवन? उम्र भर पर्दे के पीछे, मगर, पौधे से पेड़ बनने में, किरदार अभिनेता का। अंत तक संबल दिया, क्या स्वार्थ रहा होगा जड़ों का?  – कुन्दन चौहान  |  कुन्दनकृति