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जून, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

बेरोजगारी के चरम दौर में भी युवाओं के लिए मिशाल बने गैरसैंण के हरेंद्र शाह....

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ऐसे दौर में जब बेरोजगारी अपने चरम पर है और रही सही कसर कोरोना ने पूरी कर दी। युवा नौकरी के लिए दर - दर भटक रहे हैं। पढ़े - लिखे युवा भी बेरोजगार  बैठकर सरकारों के भरोसे बैठे हुए हैं। तब एक युवा जो कक्षा 12th विज्ञान वर्ग से उत्तीर्ण है। जिसके पास डी ए वी देहरादून से बीएससी की डिग्री है। अपने ही घर पर सब्जियां उगाकर ना सिर्फ खुद का रोजगार शुरू किया बल्कि अन्य लोगों को भी रोजगार दे रहा है।  मै बात कर रहा हूं मेरे मित्र हरेंद्र शाह की। इंटरमीडिएट की परीक्षा हम दोनों ने साथ ही उत्तीर्ण की थी। उसके बाद उच्च शिक्षा के लिए हरेंद्र देहरादून गए , कुछ वर्षों तक अन्य नौकरियां भी की, लेकिन अंत में उन्होंने खुद का रोजगार शुरू करने का फैसला किया। करीब एक वर्ष पहले उन्होंने  अपने ही गांव ( सिलंगा) के पास अपनी बंजर जमीन को खोदकर सब्जियां उगानी शुरू की, और आज उनकी कठिन मेहनत और लगन का परिणाम हम सब के सामने है। भारी मात्रा में विभिन्न प्रकार की सब्जियां ( लौकी, कद्दू, शिमला मिर्च, टमाटर, बैंगन, खीरा) आदि को वे ना सिर्फ आर्गेनिक तरीके से उत्पादन कर रहे हैं, बल्कि सब्...

एसडीआरएफ : "अन्संग हीरोज ऑफ उत्तराखंड"

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यूं तो हमारा उत्तराखंड वीर योद्धाओं के साहस एवम पराक्रम के लिए ही जाना जाता है। उत्तराखंड के जवानों का का देश की रक्षा में अतुलनीय योगदान को कोई भुला नहीं सकता। लेकिन उत्तराखंड जैसे राज्य जहां हर वर्ष भूस्खलन, बाढ़,  बादल फटना आदि दैवीय आपदाएं एवम सड़क दुर्घटनाओं की सैकड़ों घटनाएं होती हैं, तब यदि किसी बल की सेवाओं को भुलाया नहीं जा सकता है, तो वह बल है - एसडीआरएफ (राज्य आपदा प्रतिवादन बल)। उत्तराखंड में एनडीआरएफ की तर्ज पर ही एसडीआरएफ का गठन किया गया। जिसका उद्देश्य राज्य में प्राकृतिक हो या अप्राकृतिक सभी प्रकार की आपदाओं के दौरान तत्काल राहत एवम आपदा के दौरान बचाव कार्यों को त्वरित एवम प्रभावी तरीके से संपादित करना है। वर्ष 2013 के जून माह में हुई केदारनाथ त्रासदी को कौन भूल सकता है। उस दौरान पूरे देश की तीनों सेनाओं एवम राज्य की पुलिस ने राहत एवम बचाव अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस आपदा के समय ही राज्य स्तर पर एक ऐसे बल की आवश्यकता महसूस हुई, जो ऐसी आपदा के समय स्थिति से निपटने में सक्षम हो। इन बातों को ही दृष्टिगत रखते हुए अक्टूबर 2013 में राज्य सरकार ने...

"भाग्य तू प्रवेश कर.."

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जिंदगी की गुफा, उम्र का मुहाना, संकरा सा वक्त, भाग्य तू प्रवेश कर! संघर्षों का सितम, उम्मीदों का बोझ, लड़खड़ाते कदम, भाग्य तू प्रवेश कर! आसमां बनी मंजिल, सीढ़ियां भी तोड़ती दम, चड़कती हैं हर कदम, भाग्य तू प्रवेश कर! सब्र भी है थक चुकी, वक्त भी खफा - खफा, आशा आ फिर से भर, भाग्य तू प्रवेश कर! संयम भी रूठने को है, कोशिशें भी पूछती हर पल, छोड़ा हुआ क्यों मुझे अधर, भाग्य तू प्रवेश कर! अरसे हुए सांझ को, निशा भी तैयार बैठी, अब तो तू सूर्योदय कर, भाग्य तू प्रवेश कर!             ©®कुन्दन सिंह चौहान

जितनी सहज दिखती हैं, उतनी ही बनावटी भी हैं हमारी संवेदनाएं...!

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केरल में गर्भवती हथिनी  की मौत या यूं कहें निर्मम हत्या के बाद जिस तरह से पूरे देश में भावनाओं का ज्वार सा बह रहा है। सोशल मीडिया आदि पर संवेदनाओं का अंबार सा लगा हुआ है। पूरा भारत इस घटना पर अपना दुःख अपने - अपने तरीके से व्यक्त कर रहा है। यह सब देखकर ऐसा महसूस हो रहा है मानो हम अचानक कितने पशु प्रेमी हो गए हैं। हथिनी की दर्दनाक मौत की निसंदेह जितनी निंदा हो सकती है , वह कम ही होगी। मगर सचमुच इस कुकृत्या को अंजाम देने वालों के खिलाफ हमारा यह आक्रोश मुझे अंदर से उतना ही खोखला लग रहा है, जितनी खोखली हमारी संवेदनाएं हैं। हमारे रचे - बुने हुए इस समाज में आखिर संवेदनाओं के लिए स्थान बचा ही कहां था? जो इस घटना के बाद से ही एक ऐसे बनावटी पशु प्रेमी होने का ढोंग रचा जा रहा है। ऐसा ढोंग जो सिर्फ और सिर्फ एक -दो दिनों तक फेसबुक और ट्विटर वॉल, वॉट्सएप स्टेटस आदि की शोभा बढ़ाने तक ही सीमित है। ऐसा इसलिए लिखने पर विवश हुआ हूं , क्यों कि हम इंसानों ने कहां ऐसी घटनाओं से सीख लेनी है? इंसानों और जानवरों के बीच कहां कोई खाई बची हुई है? वरन इंसान ही अब जानवरों से अधिक अबोध , असंवेदनशील ...

"दो जून की रोटी......"

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                फोटो साभार : इंटरनेट। दिन भर चिलचिलाती गर्मी.. पसीने से नहाया हुआ, बोझ से लदा हुआ, जहन में बस, भूखे पेट के लिए निवाला, और घर परिवार से किया वादा, बड़ी मुश्किल से जिनको नसीब होती है; मेहनत की दो जून की रोटी।। ना शिकायत परिस्थितियों से, ना नाराजगी भाग्य विधाता से, बस भरोसा है दबे कंधों पर, और दिन भर थके - हारे जिस्म पर, फिर अगली सुबह निकलते, शाम की रोटी के इंतजाम में, चाहत सिर्फ मेहनत की कमाई, कभी नहीं रखता उम्मीद, उससे ज्यादा, बस जहन में घर परिवार से किया वादा, बड़ी मुश्किल से जिनको नसीब होती है; मेहनत की दो जून की रोटी।। माता - पिता के सहारे की संभाले आश, पत्नी - बच्चों के सपनों का संजोए विश्वास, तपिश सहता है,भाव निष्फल, निस्वार्थ, निष्ठा, ईमानदारी और लगन,  यहीं वो गहने उसके, जो कराते हैं उसे, वैचारिक अमीरी का अहसास.. हर दिन थकता है, हारता है। फिर खड़े उठने का रखता है माद्दा,  चुपके से सिसकियां ही सही, दर्द भी पी जाता है; वो मेहनतकश है, रोने की इजाजत भी कहां? बस जहन में घर परिवार से किया वादा, बड़ी मुश्किल से ...