धनुष बाण लिए खड़ा भाग्य...
पंख थे हौंसले भी कम नहीं उड़ने लगा मगर धुंधला सा था आसमां, ना जाने धुआं - धुआं किसने किया था चारों तरफ साजिश थी या आसमान ऐसा ही मिला था समझ नहीं पा रहा था, खैर उड़ना तो था ही फड़फड़ाते पंख सब कुछ धुंधला - धुंधला सा था आगे यकायक तीर सा एक लगा देह पर, आंखें चकरा सी गई लाख कोशिश की मगर नहीं संभल पाया और गिर गया जमीन पर, घाव से कराह रहा था मुश्किल से खड़ा उठा सामने देखा तो धनुष - बाण लिए खड़ा था भाग्य, कुछ पूछ पाता कि.. आंखे खुल गई और सब कुछ ओझल हो गया। - कुन्दन कृति