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धनुष बाण लिए खड़ा भाग्य...

पंख थे हौंसले भी कम नहीं उड़ने लगा मगर धुंधला सा था आसमां, ना जाने धुआं - धुआं किसने किया था  चारों तरफ साजिश थी या आसमान ऐसा ही मिला था समझ नहीं पा रहा था, खैर उड़ना तो था ही फड़फड़ाते पंख सब कुछ धुंधला - धुंधला सा था आगे यकायक तीर सा एक लगा देह पर, आंखें चकरा सी गई लाख कोशिश की मगर नहीं संभल पाया और गिर गया जमीन पर, घाव से कराह रहा था मुश्किल से खड़ा उठा सामने देखा तो धनुष - बाण लिए खड़ा था भाग्य, कुछ पूछ पाता कि.. आंखे खुल गई और सब कुछ ओझल हो गया।     - कुन्दन कृति

इश्क की नदी..

मानसून  का वो वक्त, जब नदियां  उफान पर रहती हैं पहाड़ों की। छिछले गधेरे भी हिलोरे मारते हैं, किसी बड़ी नदी की तरह। पानी का ये प्रवाह , जो सब कुछ  बहाने को आतुर रहता है, अपने वेग के साथ। हुबहू होता है शुरू–शुरू का इश्क, जो मानसून के, किसी गधेरे जैसे ही हिलोरे मारता है, वादे करता है, कसमें खाता है। इस बात से बेखबर कि, इश्क सिर्फ मानसून नही है। ये जीवन के हर मौसम में, बहते रहने का एक अनुबंध है। सर्द दुखों में कहीं जम कर रुक न जाए ये जीवन प्रवाह, गर्म कठनाइयों में भी कहीं सूख न जाए ये इश्क का गधेरा। वक्त गुजरता है, कहीं हमेशा के लिए, जम जाता है ये इश्क, और कहीं सूख जाता है बदलते मौसम के साथ। कुछ एक ही बचा पाते हैं, इश्क के गधेरे को, और सिर्फ बचाते नही हैं, बना देते हैं उसे बड़ी सी नदी। जो वक्त के साथ  अब छिछली नही, पारस्परिक भावों से भरकर, गहरी और शांत हो जाती है। इश्क की ये नदी, अब मानसून में हिलोरे नही मारती, बल्कि शांति और मधुर ध्वनि से, अनवरत बहती जाती है। वक्त के साथ सीख जाती है, जम कर फिर से पिघलना, सूख कर फिर से उभरना। इश्क की ये नदी। – कुन्दन कृति

मैं और मेरी असफलता..

भागते, हांफते, थकते , लड़खड़ाते गिरते, उठते, फिर संभलते, हाथ थामते, ढांढस बंधाते,  गलतियां करते, फिर एक साथ पश्चताप करते, साथ रोते और हंसते गलतियां न दोहराने का वादा करते। बार बार यहीं करते जाते मैं और मेरी असफलता। – कुन्दन कृति

रिश्तों के बांध..

बांधो को टूटते नही देखा कभी उनकी मजबूती पर  अनायास ही जलन सी होने लगती है कभी कभी। उन्हें इतना मजबूत बांध लिया  जाता है कि प्रकृति जब सब कुछ खत्म करने को आतुर होगी, तभी बांध भी खत्म होंगे। मगर बांधो को मजबूती देने वाले मानव  कभी खुद को परस्पर नही बांध पाए बांधो जितना मजबूत। निम्नतम रिएक्टर स्केल के गलतफहमियों के भूकंप भी तोड़ देते हैं रिश्तों के बांध। – कुन्दन कृति

काश..

काश.. ग्लोबल वार्मिंग का असर  निर्मम हृदयों पर भी हो पाता  तब वे भी पिघल पाते हिमनदों की तरह  और बहते  प्रेमी नदियों की तरह। – कुन्दन कृति

कवि पर आरोप..

कविताओं से प्रेम करने वाली प्रेमिका को कैसे विवश कर पाता एक कवि सिर्फ अपने प्रेम में वो चाहता था कि, सिर्फ उसकी कविताओं से ही प्रेम करे उसकी प्रेमिका। और लग गया एक कवि पर  अपनी प्रेमिका को  प्रेम में पराधीन करने का आरोप। – कुन्दन कृति

हम बन जाएं, पूर्ण विराम एक साथ

अपनी कविताओं में  खोजता हूं तुम्हें और तुम शब्द – शब्द में नजर आते हो मेरे साथ। हर पंक्ति को जैसे  ताल से ताल मिलाकर  पूरा करते हो मेरे साथ। कहीं थक कर  ठहरना हो कुछ देर तो हर अल्प विराम में तुम ठहरते हो मेरे साथ। चिन्हों , मात्राओं की हर त्रुटियों में भी कंधे से कंधा मिलाकर खड़े मिलते हो तुम साथ। बस चाहता हूं यूं ही अंतिम पंक्ति तक हम बन जाएं  पूर्ण विराम एक साथ। – कुन्दन कृति

भीगे सपने..

कुछ सपने थे  जिन्हें कमीज के ऊपर वाली जेब में रखकर मैं चलता था कभी धूप से बचाता  तो कभी ठंड से ठिठुरे ना ये सपने इसलिए बाहर से स्वेटर पहन लेता था अपना ख्याल नही रहता  बस इन सपनों का ख्याल रखता था कि इन्हे ठंड या गर्मी न लगे अचानक बेमौसम बरसात हुई जब तक इन्हे बचा पता भीग कर गिले हो चुके थे ये सपने दौड़कर घर आया  मगर तब तक रात हो चुकी थी अब सुबह होने की प्रतीक्षा है सूरज निकलेगा  तब इन भीगे सपनों को सुखा पाऊंगा। – कुन्दन कृति

भावनाओं का दाह संस्कार..

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भावनाएं, जिनका गला घोटा जा रहा था रोज। एक रोज दम तोड़ गईं, और फिर निकला जनाजा। शब्दों की भीड़ उमड़ी, कांधा देने के लिए धक्मधक्का। मगर संवेदनाओं के होंठ, सिले हुए थे हर शब्द के। अंतिम यात्रा बढ़ते जा रही थी, फिर आ गई एक त्रिवेणी, जहां संगम था, बेबसी, मजबूरी और अभागी नदियों का। लकड़ियां इकट्ठा की गई, समझौते के पेड़ की, सब तैयारियां पूरी थी, चिता पर रख दी गई भावनाएं, मगर मुखाग्नि कौन देगा? कौन अपना है इन भावनाओं का यहां? शब्द तांक रहे थे मौन की ओर, और मौन फिर से करने लगा, भावनाओं का दाह संस्कार।  – कुन्दन कृति 

जीवन का बसंत अनिश्चित...

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बसंत में खिलखिलाते , पुष्पों की रौनक देख.. भंवरे भी अनायास ही झूम उठते हैं। मंडराते हैं सुबह –शाम, और  जीवन भर की दौलत उनकी.. बड़े चाव से लूटते हैं। पुष्प बेचारा.. सुगंध है, खुबसूरती है.. मगर असहाय बना बैठा है। पूछता है प्रश्न मानो वो, कि.. ऐसी भी क्या लाचारी है? महज कुछ ही दिन हैं, जो शेष बचे हैं.. भंवरों को भी चेताता है। आखिर कब तक मैं खिला रहूंगा? कब तक तुम मंडराओगे? जीवन का बसंत अनिश्चित, निश्चित है बस झड़ने का दिन। – कुन्दन चौहान |  कुन्दनकृति