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"मांझी बन जब हुआ सवार......"

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मनोरचनाओं की नौका पर, मांझी बन जब हुआ सवार। जीवन की डोलती लहरें, पग - पग प्रश्न पूछ रहीं थी। भला उनसे बिन टकराए यूं, कैसे होगी वैतरणी पार? लहरों के इन वाजिब प्रश्नों का, प्रतिउत्तर देने की ठानी जैसे। डगमगाती नौका उतार समंदर, चुनौती लहरों की मानी जैसे। बाधाओं की ये हटधर्मी लहरें, थे गहरे भंवर निराशाओं के। मगर निडरता से बढ़ती नौका, थामे थे पतवार आशाओं के। लहरों की घेराबंदी ये कैसी, मंजिल पर जैसे धुंध सी छाई। वो हौसलें थे, जो डटे रहे, लहरों ने अब जैसे, मात थी खाई।  साहिल पर अब नौका पहुंची,  लहरों और भंवर से बोली। तुमसे टकराकर ही मंजिल पाई, इन बाधाओं ने ही आंखें खोली। मांझी को अब भिज्ञ हो चला, बिन बाधाओं के मंजिल कैसी? संघर्षों की परिणीती यहीं है, जीवन का भी यहीं आधार। मनोरचनाओं की नौका पर, मांझी बन जब हुआ सवार। ©® कुन्दन सिंह चौहान।