शुक्रिया वक्त.....
सब कुछ कुचलकर, पैरों तले। भौतिकता की काली पट्टी, बांधकर अपनी आंखों में। सरपट भाग रहा था, इंसान। क्रूरता के कफन को, मानो सिर पर बांध। प्रकृति द्वारा दिए, हर उपहार को, खुशी - खुशी, खुर्द बुर्द, कर रहा था, इंसान। कूड़े की तर्ज़ पर, खुद के माफिक, बेवजह संसाधनों, का ढेर खड़ा कर, उसकी मुंडेर पर, खड़े होकर, आसमां को छूने की, ख्वाहिश में था, इंसान। शुक्र है! आज वक्त ने खोल दी, भौतिकता की काली पट्टी, कल जरूर खोलेगी , क्रूरता के कफन को भी। और आसमां छूने को आतुर थे, जो जिद्दी पांव। गिरा कर रहेगी उनको भी, हकीकत की जमीं पर। ©® कुन्दन सिंह चौहान।