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शुक्रिया वक्त.....

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सब कुछ कुचलकर, पैरों तले। भौतिकता की काली पट्टी, बांधकर अपनी आंखों में। सरपट भाग रहा था, इंसान। क्रूरता के कफन को, मानो सिर पर बांध। प्रकृति द्वारा दिए, हर उपहार को, खुशी - खुशी, खुर्द बुर्द, कर रहा था, इंसान। कूड़े की तर्ज़ पर, खुद के माफिक, बेवजह संसाधनों, का ढेर खड़ा कर, उसकी मुंडेर पर, खड़े होकर, आसमां को छूने की, ख्वाहिश में था, इंसान। शुक्र है! आज वक्त ने खोल दी, भौतिकता की काली पट्टी, कल जरूर खोलेगी , क्रूरता के कफन को भी। और  आसमां छूने को आतुर थे, जो जिद्दी पांव। गिरा कर रहेगी उनको भी, हकीकत की जमीं पर।      ©® कुन्दन सिंह चौहान।

आखिर.. जीत पायेगा प्रकृति से..

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आसमां भी, कितना निष्ठुर होकर, बरस रहा है। जिधर नजर दौड़ रही है.. दरक रहे हैं पहाड़, टूट रहीं हैं सड़के, खिसक रही हैं पगडंडियां, उफनती नदियां, बहा ले जा रही हैं, घरों को। प्राकृतिक फिनोमिनन को, ऋतु परिवर्तन के चक्र को संघनन की प्रक्रिया को, सब कुछ दरकिनार कर, अपने कुकृत्यों के कारण, हम बना चुके हैं इसे, आफत की बारिश। और भूल रहे हैं.. इस आफत का, कौन है सूत्रधार? किसने किया है, मजबूत से पहाड़ों को कमजोर? किसने छेड़ा है, नदी - नालों और किनारों को? मौसम के इस अप्रत्याशित परिवर्तन का, कौन है जिम्मेदार? हमने ही तो डाली हैं दरारें, विकास के नाम पर। हमने ही तो फोड़े हैं, विस्फोटक.. निर्माण के नाम पर।  हमने ही तो बनाए हैं, जंगल कंक्रीट के.. आधुनिकीकरण के नाम पर। हमने ही तो हथियाए हैं, नदी और नाले.. किनारों पर हमने ही तो, बनाई है बड़ी - बड़ी इमारतें। न्यौता हमने ही तो दिया है, प्रकृति को.. कि आओ! चलो टकराते हैं। कौन किसे.. पहुंचा सकता है, ज्यादा नुकसान.. आओ आजमाते हैं। अब सहमा सा क्यों है इंसान, डर किस बात का? देख प्रकृति का विकराल रूप.. जितना लड़ सकता है, उतना लड़। वैसे भी होना ह...

लम्फू... हमारे बचपन का साथी..

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लम्फू..... ना जाने.. कितनी स्मृतियां, समेटे हुए है, यह तस्वीर। बचपन में.. कॉपी, किताब, और पेन तो थी, मगर मानो, पहला स्तंभ यहीं था; हमारे पढ़ाई तंत्र का। जब बोझ सी, लगती थीं किताबें; माता - पिता का डर, और बेचारा बचपन। तब मजबूरीवश.. बैठते तो थे, पढ़ाई के बहाने। मगर पूरा वक्त जैसे, इस लम्फू को निहारने, इसके साथ खेलने, बुझाने - जलाने में ही, बीत जाता था। कभी ऐसी शाम, जब खबर लगती, कि मिट्टी तेल नहीं है आज, तब मानो, खुशियों की सौगात ले आता था, यहीं लम्फू। और उन्मुक्त करा देता था, जैसे बोझिल से बचपन को। बड़े बुजुर्गों की, नजरों से बचकर.. ना जाने, अनेकों बार, सिर के बाल, और आंखों के भौं.. जलाने के भी, स्मृतियां महफूज हैं, मानो, इस लम्फू के साथ। कभी इसकी, बाती निकलने पर.. झट से उसे ठीक करने के, हुनर ने, हम में से, शायद कितनों को, बनाया दिया होगा, बचपन मे घर का.. सबसे होनहार बेटा। कभी जानबूझ कर, इसकी बाती को, नीचे खिसका कर, खराब हो जाने के बहाने ने भी, कॉपी, किताबों से दूर, सुकून भरी, ना जाने.. कितनी नटखट रातों को, हमें जैसे तोहफों में दिया होगा। फिर अंत में, भूले नहीं भुलाई जा सकतीं...

प्रकृति के निराले रंग....

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दूर पहाड़ियों पर, उमड़ते - घुमड़ते, बादल। उनकी ओट में, छिपा - छिपा सा सूरज। ठंडी सी हवाओं के झोकों का अहसास। एकाएक चारों तरफ, पेड़ों पर लदी, हरी - हरी पत्तियां। खेतों में मखमल सी, हरियाली। बाड़े - सगोडों में, मिर्ची, टमाटर, बैंगन,भिंडी के, उगे हुए छोटे से पौधे, महसूस कर रहे हैं अपना बचपन। कितनी जल्दी, हम पा चुके हैं, आसमा सी छूती लंबाई। इस खुशी में मानो, लहलहाती - इठलाती मुंगरी की लंबी सी पत्तियां। पास ही पेड़ों और ठंगरों की जड़ों से, मानों दोस्ती का हाथ बढ़ाते, और उनसे, लिपटने को बेताब, लौकी, कद्दू और ककड़ी के लगुले। ये जेठ के अंतिम दिनों, और आसमां और धरती के, मिलन माह, आषाढ के आने की, आहट सी है।   जीवन दर्शन, ढूंढिए प्रकृति के इन निराले रंगो में। सचमुच जेठ के बाद, और सावन से पहले, अल्हड़पन , लकड़पन, संवरते - सजते, यौवन का प्रतीक, मानों आषाढ़ सी ही, हम सब की जिंदगी है। जो खींचता है, बचपन और वृद्ध अवस्था के, बीच की रेखा। उकेरता है मानो, हम सब की वास्तविकताओं को। जहां तपना भी है, और खिलना भी है। तब जाकर कहीं, बदलेगा जीवन सौंण,भादो और असूज में।। ©®कुन्दन सिंह चौहान।

पर्यावरण दिवस.....

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बेतरतीब विकास के नाम पर, कितना विनाश किया है हमनें। आधुनिकीकरण की अंधी दौड़ में, अंधाधुंध काटे हैं हमने जंगल। बलपूर्वक रोकी हैं हमनें धाराएं, शांत बहती, निर्मल नदियों की। चिंतन कीजिए.. प्रकृति को, कितना चिढ़ाया है हमने? तोड़े - फोड़े हैं हमने मजबूत पहाड़, चीरते आ रहे हैं वक्ष धरती का, कर चुके हैं, छत - विछत.. प्रकृति की देह को। सोचिए.. जल, जंगल और जमीन को, कितना चिढ़ाया है हमने? दम घुट गया है अब, प्रकृति का भी। कब तक सहेगी आखिर.. कितने प्रबोधन दिए प्रकृति ने, कि हम सुधर जाएं, रोक दें अपने कुकृत्यों को। मगर दंभी मानव, मार चुका है.. प्रकृति के प्रति, अपनी संवेदनाओं को। अब इंसान चाहे तो, हर दिन मना ले तू, पर्यावरण दिवस। मगर प्रकृति के प्रति मृत संवेदनाओं का भुगतान, सूद सहित भुगतने को, तू तैयार रह।। ©®कुन्दन सिंह चौहान  

मै निहारता रहा...

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एक रोज तड़के, मै निहारने लगा , प्रकृति को। ओंस की बूंदों को, बिछोना बनाकर। कोहरे की चादर, ढकी हुई हो, गले तक जैसे। आधे खुले नयन, और शाम्भवी-मुद्रा में लीन, दिख रही थी, प्रकृति। मै निहारता रहा...  पंछियों का कलरव, सुबह की गुंजन, मानो गुनगुना रही थी, प्रकृति के कानों में। दूर बड़े बड़े, वृक्षों के बीच, स्वतः निर्मित, रोशनदानों को, चीरती हुई, सूर्य की पहली किरण, और उसकी अरुणिमा, मानो जगा रही थी, प्रकृति को। मै निहारता रहा.. प्रकृति उठी, और स्नेह दिखाकर सूर्य की आभा ने, ओंस के बिछोने, और कोहरे की चादर को, समेट कर रख दिया हो, मानो किसी अदृश्य कोने में। मै निहारता रहा... पलक झपकते ही, शांत और सहमी सी, प्रकृति का आवरण, खिलखिला उठी जैसे। सादगी भरी, मगर आकर्षक  सुबह के अलंकरण से, मानो  विभूषित हो गई थी, प्रकृति। ©®कुन्दन सिंह चौहान