संदेश

मई, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

श्रद्धांजलि.....

चित्र
चिता पर लेटी मृत देह, पंचतत्व में, विलीन होने से पहले भी, कर रही होगी संवाद। पहाड़ों से,  नदियों से,  वायु से, जंगलों से, हिमनदों से। छत - विछत पहाड़, बंधी हुई नदियां, प्रदूषित वायु, अंधाधुंध कटे हुए जंगल, टूटते - फूटते हिमनद, परमात्मा में लीन होती देह को, आख़िरी वक्त भी, सुना रहे होंगे, अपनी आपबीती। मगर शय्या पर लेटी देह.. तब भी, ढांढस बंधा रही होगी, जल , जंगल, जमीन को। जीवन भर के, अपने संघर्षों की स्मृतियों में, उन्हें घुमा रही होगी। उनके लिए लड़ी , लड़ाइयों की गाथाएं सुनाकर, उनसे विदा ले रही होगी। तब कुछ - छण के लिए, जरूर महसूस की होगी, प्रकृति ने भी शून्यता। रोए होंगे पर्वत, और सिसक रही होंगी नदियां भी। शोक की लहर, दौड़ी होगी जंगलों में। स्तब्ध हो गए होंगे, हिमनद भी। और हिमालय सी.. विशाल देह, हो गई होगी परिवर्तित, आत्मा के शाश्वत अस्तित्व में। श्रद्धांजलि। ©® कुन्दन सिंह चौहान।

गुजरे वक्त की गठरी....

चित्र
गुजरे वक्त की गठरी को, कंधे पर लादे , चलता जा रहा था। एक पल के लिए रुका; बैठा फुर्सत के चौराहे पर। सूझा मन को, कि कुछ बोझ निकालकर, गठरी से; फेंक दूं कहीं दूर। गठरी उतारी कंधे से; पागलपन देखो! छांटने लगा, गुजरे वक्त को, नादानियां निकाली, बेबसी , लाचारियां छांटी। कुछ गम थे दबे से, बीन कर उन्हें भी सलीखे से, कर दिया गठरी से बाहर। सामने दिख रहा था, बदसूरत सा एक कूड़ादान; बड़े अक्षरों की लिखावट उसपर, कि "विस्मृतियों को यहां डालें।" नादानियां, बेबसी, लाचारियां, गम, डाल कर कूड़ेदान में , बांध कर गठरी फिर से, उठाई और लादी कंधे पर। चलने लगे अब पांव रौब से हां! कंधा बदला था इस बार, मगर हैरान , परेशान फिर से; ये क्या ? गठरी तो भारी ही है। निकाल तो दिए थे, कुछ लम्हें विस्मृतियां समझ। अब एहसास हो चला था, खट्टी - मीठी, जैसी भी हों। गुजरे वक्त की गठरी से, अपनी सोहलियत देख, स्मृतियों को भूलना, सचमुच असम्भव सा है। लादे रखनी होगी, आखिर तक कंधों पर। भारी - भरकम, गुजरे वक्त की गठरी। जब तक कि, पांव अकड़ ना जाएं, और प्रारम्भ ना हो जाए, यात्रा अनन्त की। ©®कुन्दन सिंह चौहान। ...