"मांझी बन जब हुआ सवार......"



मनोरचनाओं की नौका पर,
मांझी बन जब हुआ सवार।

जीवन की डोलती लहरें,
पग - पग प्रश्न पूछ रहीं थी।
भला उनसे बिन टकराए यूं,
कैसे होगी वैतरणी पार?

लहरों के इन वाजिब प्रश्नों का,
प्रतिउत्तर देने की ठानी जैसे।
डगमगाती नौका उतार समंदर,
चुनौती लहरों की मानी जैसे।

बाधाओं की ये हटधर्मी लहरें,
थे गहरे भंवर निराशाओं के।
मगर निडरता से बढ़ती नौका,
थामे थे पतवार आशाओं के।

लहरों की घेराबंदी ये कैसी,
मंजिल पर जैसे धुंध सी छाई।
वो हौसलें थे, जो डटे रहे,
लहरों ने अब जैसे, मात थी खाई।

 साहिल पर अब नौका पहुंची,
 लहरों और भंवर से बोली।
तुमसे टकराकर ही मंजिल पाई,
इन बाधाओं ने ही आंखें खोली।

मांझी को अब भिज्ञ हो चला,
बिन बाधाओं के मंजिल कैसी?
संघर्षों की परिणीती यहीं है,
जीवन का भी यहीं आधार।

मनोरचनाओं की नौका पर,
मांझी बन जब हुआ सवार।


©® कुन्दन सिंह चौहान।








टिप्पणियाँ

  1. वाह जितनी तारीफ करूँ उतनी कम , लाजवाब शानदर जानदार जबरदस्त🙏🙏💞

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  2. Waah,bahut accha likha h.
    Bhai khub pado aur accha likhte raho.

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत खुब भुला।

    बहुत जोशीली कविता

    ईश्वर आपको यश्श्वी करे

    जवाब देंहटाएं
  4. मनोरचनाओं की नौका पर,
    मांझी बन जब हुआ सवार
    मिलता भी रहा ,लहरों से टकराता भी रहा
    संगर्ष की परिणीति क्या होगी
    बिन सोचे चलता भी रहा चलाता भी रहा .....

    अपनी सी लगी इसीलिए लिख दिया कुंदन भाई

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