निष्पक्षता : तेरे कातिल हम।
वैचारिक कट्टरता के खंजर को,
सबने उसकी पीठ पर घोपा।
घायल रहा बेचारा दिनों तक,
दोगलेपन की जमीं को सौंपा।
रह गई थी कुछ जो सांसे बाकी,
सब राजनीति ने सोख ली जैसे।
जीते - जी उसे दफनाने को,
सबने ताकत झोंक ली जैसे।
उसके कत्ल के खून से लथपथ,
सबके ही तो हाथ सने हैं।
राजनीति का भूत सवार है,
बदले के बस बाण तने हैं।
उन्मादी बनकर बैठ गया जब,
तथाकथित चौथा स्तम्भ भी।
बड़े लोकतांत्रिक देश का तमगा,
अब तो चूर हुआ ये दंभ भी।
संवैधानिक पद भी कहां अछूते?
नेताओं की मन की बोले।
संविधान - न्याय का तराजू गायब,
तटस्थता से कौन अब तौले?
विवेकशीलता बची कहां है?
"निष्पक्षता" - ये क्या बला है?
इशारों पर नृत्य चल रहा है,
भ्रष्ट राजनीति की यहीं कला है।
नैतिकता को नोक पर रखकर,
कट्टरता पहले, मानव हम तब हैं।
हो - हल्ला , अब कोलाहल क्यों है?
इसके कातिल हम सब हैं।
©® कुन्दन सिंह चौहान।
उन्मादी बनकर बैठ गया जब,
जवाब देंहटाएंतथाकथित चौथा स्तम्भ भी।
बड़े लोकतांत्रिक देश का तमगा,
अब तो चूर हुआ ये दंभ भी।
मैं निशब्द हूं, बहुत बेहतरीन रचना है आपकी कुंदन जी सदा जय रहे आपकी, आपकी कलम की जय रहे, आप खुशनसीब हैं ऐसी आजादी मेरे पास नहीं है
संविधान - न्याय का तराजू गायब,
जवाब देंहटाएंतटस्थता से कौन अब तौले?
वर्तमान हालातों की ओर संकेत करती बेहतरीन लाजवाब शानदार रचना का सृजन किया है
कलमकार तेरी जय हो����������
करारा लिखा
जवाब देंहटाएंआज के भारत की दयनीय स्थिति को कितनी गहराई से चित्रित कर दिया। एक एक पद देश की गिरती सामाजिक राजनीतिक स्तर को बयां कर गया।
जवाब देंहटाएंनैतिकता को नोक पर रखकर,
कट्टरता पहले, मानव हम तब हैं।
हो - हल्ला , अब कोलाहल क्यों है?
इसके कातिल हम सब हैं।
सच, हम सभी तो जिम्मेदार हैं इन हालातों के लिए, पर हम हैं कि आत्ममंथन की बजाय एक दूसरे की ओर उंगली उठाने से बाज नहीं आते।