घड़ा भरें, फिर खुद ही फोडें!



निश्चल बहता नीर पवित्र जो,
आओ उसकी हम धारा मोड़ें!

उपवन जो आभूषण धरती के,
आओ क्रूर बन उनको काटे - तोड़ें!

संस्कृति - सभ्यताओं का गला रेंत कर,
आओ हम बस संसाधन जोड़ें!

मानवता का पथ भ्रष्ट करें हम,
आओ करुणा, भाव दया भी छोड़ें।

परस्पर धर्मों में बंट जाते हैं,
आओ लड़ने का रस्ता खोलें!

सच्चाई की भी परिभाषा बदलें,
आओ जोरों से झूठ हम बोलें!

चरित्र , समर्पण भाव नकारें।
आओ धन दौलत से काबिलियत तौलें!

पड़ें रहें निर्जीवों की श्रेणी में,
आओ धरती का लहू निचोडें!

इंसानियत की निर्मम हत्या कर,
आओ जात - पात का चोला ओढ़ें!

चलो अंबार लगाएं पापों का,
आओ घड़ा भरें, फिर खुद ही फोड़ें!

    ©® कुन्दन सिंह चौहान।






टिप्पणियाँ

  1. वाह बेहद सुंदर सार्थक,,

    सच्चाई की भी परिभाषा बदलें,
    आओ जोरों से झूठ हम बोलें!

    चरित्र , समर्पण भाव नकारें।
    आओ धन दौलत से काबिलियत तौलें!

    पड़ें रहें निर्जीवों की श्रेणी में,
    आओ धरती का लहू निचोडें,
    बेहतरीन

    जवाब देंहटाएं
  2. वाह, यथार्थ का बेहतरीन चित्रण .... बहुत सुंदर।
    💐💐

    जवाब देंहटाएं
  3. वाह ! गजब का लिखते हो गुरुजी 🙏

    जवाब देंहटाएं
  4. वाह भाई साहब। सारगर्भित। यथार्थ और सार्थक वाक्य को पंक्तिबद्ध कियाहै।। बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत ही सुन्दर कविता 😍😍❤️👍

    जवाब देंहटाएं
  6. Hamesha ki tarh bahut accha likha h bhai...Maa saraswati ki krpa bani rahe

    जवाब देंहटाएं

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