श्रद्धांजलि.....




चिता पर लेटी मृत देह,
पंचतत्व में,
विलीन होने से पहले भी,
कर रही होगी संवाद।

पहाड़ों से, 
नदियों से, 
वायु से,
जंगलों से,
हिमनदों से।

छत - विछत पहाड़,
बंधी हुई नदियां,
प्रदूषित वायु,
अंधाधुंध कटे हुए जंगल,
टूटते - फूटते हिमनद,
परमात्मा में लीन होती देह को,
आख़िरी वक्त भी,
सुना रहे होंगे,
अपनी आपबीती।

मगर शय्या पर लेटी देह..
तब भी,
ढांढस बंधा रही होगी,
जल , जंगल, जमीन को।
जीवन भर के,
अपने संघर्षों की स्मृतियों में,
उन्हें घुमा रही होगी।
उनके लिए लड़ी ,
लड़ाइयों की गाथाएं सुनाकर,
उनसे विदा ले रही होगी।

तब कुछ - छण के लिए,
जरूर महसूस की होगी,
प्रकृति ने भी शून्यता।
रोए होंगे पर्वत,
और
सिसक रही होंगी नदियां भी।
शोक की लहर,
दौड़ी होगी जंगलों में।
स्तब्ध हो गए होंगे,
हिमनद भी।

और हिमालय सी..
विशाल देह,
हो गई होगी परिवर्तित,
आत्मा के शाश्वत अस्तित्व में।

श्रद्धांजलि।

©® कुन्दन सिंह चौहान।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

धनुष बाण लिए खड़ा भाग्य...

स्वार्थ जड़ों का...?

इश्क की नदी..