गुजरे वक्त की गठरी को,
कंधे पर लादे ,
चलता जा रहा था।
एक पल के लिए रुका;
बैठा फुर्सत के चौराहे पर।
सूझा मन को,
कि कुछ बोझ निकालकर,
गठरी से;
फेंक दूं कहीं दूर।
गठरी उतारी कंधे से;
पागलपन देखो!
छांटने लगा, गुजरे वक्त को,
नादानियां निकाली,
बेबसी , लाचारियां छांटी।
कुछ गम थे दबे से,
बीन कर उन्हें भी सलीखे से,
कर दिया गठरी से बाहर।
सामने दिख रहा था,
बदसूरत सा एक कूड़ादान;
बड़े अक्षरों की लिखावट उसपर,
कि "विस्मृतियों को यहां डालें।"
नादानियां, बेबसी, लाचारियां, गम,
डाल कर कूड़ेदान में ,
बांध कर गठरी फिर से,
उठाई और लादी कंधे पर।
चलने लगे अब पांव रौब से
हां!
कंधा बदला था इस बार,
मगर हैरान , परेशान फिर से;
ये क्या ? गठरी तो भारी ही है।
निकाल तो दिए थे,
कुछ लम्हें विस्मृतियां समझ।
अब एहसास हो चला था,
खट्टी - मीठी, जैसी भी हों।
गुजरे वक्त की गठरी से,
अपनी सोहलियत देख,
स्मृतियों को भूलना,
सचमुच असम्भव सा है।
लादे रखनी होगी,
आखिर तक कंधों पर।
भारी - भरकम,
गुजरे वक्त की गठरी।
जब तक कि,
पांव अकड़ ना जाएं,
और प्रारम्भ ना हो जाए,
यात्रा अनन्त की।
©®कुन्दन सिंह चौहान।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें