स्वार्थ जड़ों का...?
अंकुर इठलाता हुआ,
निहारने लगा धरती को।
बड़ा हुआ, पौधे से पेड़ बना,
शाखें पसारी चारों ओर,
पत्तियां, कोंपले, फूल, फल..
सारा यौवन पा लिया;
अब अकारण दंभ भी,
महसूस कर रहा था।
जितनी ऊंचाई पा रहा था,
उतना ही दूर जा रहा था,
अपनी बुनियाद से।
इधर जड़ें,
जो कभी नहीं देख पाई,
अपना यौवन।
क्या किसी और का भी,
होगा ऐसा अधोमुखी जीवन?
उम्र भर पर्दे के पीछे,
मगर,
पौधे से पेड़ बनने में,
किरदार अभिनेता का।
अंत तक संबल दिया,
क्या स्वार्थ रहा होगा
जड़ों का?
– कुन्दन चौहान | कुन्दनकृति
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