इश्क की नदी..
मानसून
का वो वक्त,
जब नदियां
उफान पर रहती हैं
पहाड़ों की।
छिछले गधेरे भी
हिलोरे मारते हैं,
किसी बड़ी नदी की तरह।
पानी का ये प्रवाह ,
जो सब कुछ
बहाने को आतुर रहता है,
अपने वेग के साथ।
हुबहू होता है
शुरू–शुरू का इश्क,
जो मानसून के,
किसी गधेरे जैसे ही
हिलोरे मारता है,
वादे करता है,
कसमें खाता है।
इस बात से बेखबर कि,
इश्क सिर्फ मानसून नही है।
ये जीवन के हर मौसम में,
बहते रहने का एक अनुबंध है।
सर्द दुखों में
कहीं जम कर रुक न जाए
ये जीवन प्रवाह,
गर्म कठनाइयों में भी
कहीं सूख न जाए
ये इश्क का गधेरा।
वक्त गुजरता है,
कहीं हमेशा के लिए,
जम जाता है ये इश्क,
और कहीं सूख जाता है
बदलते मौसम के साथ।
कुछ एक ही बचा पाते हैं,
इश्क के गधेरे को,
और सिर्फ बचाते नही हैं,
बना देते हैं उसे बड़ी सी नदी।
जो वक्त के साथ
अब छिछली नही,
पारस्परिक भावों से भरकर,
गहरी और शांत हो जाती है।
इश्क की ये नदी,
अब मानसून में हिलोरे नही मारती,
बल्कि शांति और मधुर ध्वनि से,
अनवरत बहती जाती है।
वक्त के साथ सीख जाती है,
जम कर फिर से पिघलना,
सूख कर फिर से उभरना।
इश्क की ये नदी।
– कुन्दन कृति
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें