पूछना था प्रकृति से...
वृक्ष अपनी आड़ में,
प्रदान करते हैं शीतलता।
पूछना था वृक्षों से!
भरी दोपहरी की तपिश को,
कैसे सहते होंगे वो?
दिए तले तिमिरता,
प्रकाशमय करता चहुं ओर।
पूछना था दियों से;
अन्धकार तले खुद रहकर भी,
कैसे जलते होंगे वो?
पीती नहीं कभी खुद को,
बुझाती पिपासा धरा की।
पूछना था उन नदियों से;
इतना निस्वार्थ भाव संजोए,
कैसे बहती होंगी वो?
प्रतिदिन जगाता जग को,
भूलवश भी भूल ना करता।
हम मानव क्या देते उसको,
कण - कण में जो उजियारा भरता।
पूछना था उस दिनकर से भी,
कैसे अडिग रहता है वो?
प्राणनाथ बने हर प्राणी के,
उन्मुक्त सा अहसास कराते।
मानव ने तो कब कसर है छोड़ी,
कुकृत्यों से रोज जहर भराते।
अपने ही जब दुश्मन बन बैठे,
पूछना था हवाओं से भी,
फिर कैसे चलती होंगी वो?
प्रकृति पालती - पोषती हमें,
हम रौब जमाते उस पर।
वो संरक्षण देती गोद में अपनी,
हम रोष जताते उस पर।
वो हजारों अदृश्य त्याग है करती,
हम अहसान जताते उस पर।
इतना सब कुछ सहती है;
फिर भी सबको आश्रय देती।
पूछना था प्रकृति से भी,
मां रूपी ममतामयी हृदय;
फिर कैसे रखती होगी वो?
©®कुंदन सिंह चौहान।
Waha...kya likha h sir ..😇👌
जवाब देंहटाएंThanks
हटाएंवाह कुंदन भाई गजब
जवाब देंहटाएंआभार । विपिन भाई।
हटाएंबहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंआभार।।
हटाएंवाह ! गजब की कविता लिखते हो जी 👍
जवाब देंहटाएंशुक्रिया।।
हटाएंबहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंआभार।।
हटाएंवाह भाई, बहुत उम्दा��
जवाब देंहटाएंअती सुन्दर,
जवाब देंहटाएंभावपूर्ण
आशीर्वाद, ऐसे ही सोचने पर विवश करती कविताये, सही मायनो मे बदलाव की तरफ लोगो को अग्रसर करती है।
आभार भाई साहब। ❣️🙏
हटाएंबहुत ही बढ़िया रचना।����
जवाब देंहटाएंKeep it up��
आभार मैम।🙏
हटाएंबहुत सुंदर
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