मैं भी उत्तरायण का इंतजार कर रही हूं ...
मुझे खुद का परिचय देने की आज आवश्यकता महसूस हो रही है। मैं उस देश की "शिक्षा व्यवस्था" हूं, जिस देश को कभी "जगतगुरु" के नाम से संबोधित किया जाता था। ज्ञान के दीपक का प्रज्वलन भी मेरे भारत से ही माना जाता है। पूरे विश्व में ऐसी छाप कि, इकबाल भी लिख बैठे -
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।
सदियों रहा है दुश्मन, दौर - ए - जहां हमारा।।
मगर आज जितना दुख मुझे अपने नसीब पर होता है, उससे कई ज्यादा तरस मुझे मानव द्वारा बनाए गए उन नए उद्देश्यों पर आता है, जो नैतिकता के पथ को तो भूल ही चुके हैं, वरन "नैतिकता" शब्द ही मानव सभ्यता की जीवन शैली से धकेल कर बाहर कर चुके हैं। और उन उद्देश्यों की प्राप्ति मात्र ही मेरी छवि को धूमिल करने के लिए काफी थी। व्यक्तित्व विकास के मेरे मूल सिद्धान्त की तौहीन तो की ही गई, बल्कि निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए मुझे जैसे निर्वस्त्र भी कर दिया गया। मेरे बिना मानव और जानवर दोनों समान ही होते हैं। मै ही मानव को उसकी पहचान दिलाती हूं।अफसोस की आज मेरा लक्ष्य निर्धारित नहीं है। और इसके बिना मेरे मार्ग में भटकाव बहुत ही सहज है। मेरे निवास को बड़े आदर से मंदिर की श्रेणी में रखा जाता था, जहां मुझे पाकर मानव श्रद्धा भाव से खुद को कृतज्ञ समझता था। और आज मै खुद को एक ऐसे चौराहे पर खड़ी पाती हूं, जहां सिर्फ और सिर्फ मुझे मेरे व्यापारी नजर आते हैं। मुझे इतना निर्बल बना दिया गया है कि उन व्यापारियों की कठपुतली मात्र बनकर रह गई हूं। जिन्हें मुझे सबल बनाना था, मेरे सानिध्य में जिन्हें अपना भविष्य प्रकाशमय कर संसार में अपने अस्तित्व की सार्थकता को एक जिम्मेदार नागरिक बनकर साबित करना था। मेरे प्रकाश के उन सभी स्रोतों को धीरे - धीरे ख़तम कर, उन्हें अन्धकार में रखकर सिर्फ संसाधन मात्र बनाया जा रहा है। मानवता के पाठ को हटाकर संपदा और संसाधन का पाठ पढ़ाया जा रहा है। शांति से यह दुर्दशा देखने के सिवाय मेरे पास दूसरा कोई विकल्प नजर नहीं आ रहा है। काश मेरे हाथों , मेरे पैरों, मेरे मस्तिष्क का संचालन मैं खुद कर पाती। काश मैं अपनी इस जर्जर हालत के खिलाफ धरना, आंदोलन, भूख हड़ताल आदि कर पाती। काश मैं उनके साथ खड़े होकर चिल्ला पाती, चीख पाती, जिन्हें मेरे मूल उद्देश्यों से भटकाया जा रहा है। काश मैं उन नीति नियंताओं की पोल खोल पाती, जो मेरे वास्तविक स्वरूप को नकार कर , मेरे नकली स्वरूप को समाज में फैला चुके थे। काश मै उन सब व्यापारियों से खुद को मुक्त करा पाती, जिन्होंने मुझे व्यापार का एक साधन बना दिया है। काश मैं उन सरकारों को कोस पाती, जो समय - समय पर मेरे सुधार के नाम पर मेरी गुणवत्ता को धीरे - धीरे नष्ट करते गए। मैं देश के भविष्य की निर्माणकर्ता थी, किन्तु परिस्थितिवश आज खुद के भविष्य के प्रति आशंकित हूं। मुझे नहीं मालूम आने वाले भविष्य में मुझे बचाया भी जाएगा या नहीं। मुझे नहीं मालूम कि मुझमें सुधार कर पुनः मेरे खोए हुए अस्तित्व को बचाया जाएगा या नहीं।
हां, बहुत कम लोग जो ईमानदारी , निष्ठा और पूरे समर्पण के साथ मुझे जिंदा रखने में अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ते। उन्हें मेरी नकारात्मकता, मेरा भय, मेरी आशंका जरूर सता रही होगी। मेरे प्रति उनकी कर्तव्यपरायणता को देखकर मुझे भी उन्हें ठेस पहुंचाना तकलीफ दे रहा है। लेकिन मेरी सच्चाई से वे भी वाकिफ हैं। वे मन ही मन स्वीकार भी कर रहे होंगे कि मैं सच ही कह रही हूं। मेरे प्रति उनकी ईमानदारी का इनाम शायद उन्हें कदम - कदम पर संघर्षों का सामना करे के मिलता भी रहता होगा। जितनी सांसे मुझमें बची हैं, शायद उनके ही कारण बची हुई हैं। ऐसे दौर में भी मुझे जिंदा रखने के लिए वे लोग मेरे लिए दूत से कम नहीं हैं। अगर थोड़ा भी समाज आज ऐसे लोगों का सम्मान करे। मुझे बचाए रखने में यहीं उनका सबसे बड़ा योगदान होगा। दुख इस बात का भी है कि देश आजाद तो बहुत पहले हो गया था, लेकिन मुझ पर गुलामी के सोच की जंजीरें आज भी बंधी हुई हैं। मेरा प्रशासनिक ढांचा आज भी गुलामी की जकड़न महसूस करता है। आज भी चतुर अंग्रेज मैकाले की सोच की बू मुझमें घुली हुई है। समय के साथ और जहरीली बनकर मुझमें घुल चुकी है। मैं हिंदी के लिए तरसती हूं। और अंग्रेजी मुझ पर थोपी जाती है। इतनी तेजी से अंग्रेजीकरण कि वह दिन दूर नहीं जब हिंदी इतिहास का विषय बन कर रह जाएगी।
एक दूसरा पहलू संस्कारों का भी आता है। शिक्षा और संस्कार एक दूसरे के पूरक माने जाते थे। आज आधुनिकता की अंधी दौड़ में समाज का सिकुड़न तो हुआ ही है। परिवार भी ख़तम हो गए हैं। इंसान ऐकेकी पन चाहता है। मैं गुरुकुलों से, स्कूल और कॉलेजों के बाद अब हर वॉट्सएप ग्रुपों में खुद को कैदी की तरह पा रही हूं। हां शिथिलता समय के साथ आवश्यक है, लेकिन मेरे उद्देश्यों और लक्ष्यों को इतना संकुचित कर दिया जाएगा। ऐसा मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था। मुझे संकुचित होने से रोकिए। शिथिल बनाइए, लेकिन मेरे मूल को न भूलिय। यहीं मुझे बचाने का एक मंत्र हो सकता है।
वरना अपनी अंतिम सांसे गिनने को मजबूर हूं। बाणों की शैया पर पड़ी हूं। पितामह भीष्म की तरह मैं भी अपने "उत्तरायण" का इंतजार कर रही हूं।
©® कुन्दन सिंह चौहान
Speechless.....kese sochte h aap itna htt k.u have fresh touch in ur writing nd the same time u have a topic which is rooted deep from years....keep it up....congratulations😊😊
जवाब देंहटाएंThanks a lot for your appreciations.. 🙏
हटाएंक्या,,, गजब की अभिव्यक्ति है,,, सच भी👌
जवाब देंहटाएंबहुत आभार भाई जी।🙏☺️
हटाएंAppriciable Thoughts bro
जवाब देंहटाएंThanks a lot bro💐🙏
हटाएंBehtreen lekh .
जवाब देंहटाएंआभार निशांत भाई। 💐🙏
हटाएंबेहतरीन अभिव्यक्ति वर्तमान शिक्षा का एक करूणामयी सन्देशह ,,बहुत सटीक
जवाब देंहटाएंआभार। 🙏
हटाएंउम्दा लेखन ���� एवं सटीक आकलन����
जवाब देंहटाएं