भला ऐसे भी क्यों मरूं मैं? ...
भऊंरे के भय से कभी,
पुष्प नहीं खिलता है क्या?
मधुर सुगंधित रस चूसता,
विचलित पुष्प होता है क्या?
संघर्षों ने तो,
हमें पाला है।
हादसों ने हमें,
संभाला है।
फिर क्षणिक दुःख दर्दों से,
क्यों डरूं मैं?
तप्ती भट्टी में,
जैसे मिट्टी हो,
ऐसे वक्त ने हमें,
ढाला है।
चला जब भी
मंजिल पाने,
राहों ने ही बदला,
पाला है।
फिर पूर्व नियत भाग्य से;
क्यों लडूं मैं?
हर मुश्किल तो,
गले लगाए हैं,
वक्त ने भी जैसे,
प्रतिद्वंदी समझ।
हर किस्म के,
बाण चलाएं हैं।
फिर हर वक्त अनुबंधन,
क्यों करूं मैं?
चुभते सूलों से,
भला क्यों डरूं मैं?
बाधाओं की जो,
दीवारें पर्वत सी,
हर दीवार को,
लांघते आए हैं।
ऋतुओं के संग,
तरू को छोड़े,
भला पल्लव सा भी,
क्यों झड़ू मैं?
संघर्षों को ही,
राह बनाऊं,
निराधार सा,
जी गए बस;
भला ऐसे भी,
क्यों मरूं मै?
©® कुन्दन सिंह चौहान।
Chuvte sulo se bhala kyu daru mai .. aise bhi kyu bhala maru mai line bhut strong message de raha hai
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत आभार।।🙏
हटाएंTouching (^_^♪)
जवाब देंहटाएंThanks akshy 🙏
हटाएंइस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंThanis🙏
हटाएंwaah behad sundre
जवाब देंहटाएंआभार।🙏
हटाएंझकझोर देने वाली कविता है भुला।
जवाब देंहटाएंबहुत-बहुत प्यार, बधाई और शुभकामनाएं ।
आभार भाई साहब।🙏❣️
हटाएंलाजवाब भैजी
जवाब देंहटाएंआभार भाई जी।🙏
हटाएंकाफी अच्छा लिखते हो आप।�� गहराई होती है आपकी रचनाओं में।❤️��
जवाब देंहटाएंआभार मैम।🙏
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