कंडाली की झपाक और झरझराहट.....

आज भी जब इस कंडाली के पौधे को तस्वीर में देखता हूं तो अंदर से एक झरझारहट सी उत्पन्न हो जाती है। तो सोचिए अगर असली में ये पौधा हमारे नजदीक हो, तो क्या हाल होगा। यह कहानी सिर्फ मेरी नहीं, बल्कि हर उस पहाड़ी की होगी, जिसे बचपन से ही इस कंडाली के नाम से डराया जाता था। और बच्चों को कंडाली से डराने का यह सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है।
सबसे पहले कंडाली के पौधे से जुड़े कुछ तथ्यों पर नजर डालते हैं। यह पौधा जिसे अंग्रेजी में "नेटल" के नाम से जाना जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम "URTICA DIOICA" है। यह अर्टिकाकेई वनस्पति फैमिली का होता है। इसका वास्तविक नाम अर्टिका पर्वीफ्लोरा है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो इस पौधे का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। शरीर में पित दोष और शरीर की गर्मी को दूर करने के लिए भी इसका उपयोग किया जाता है। हमारे पहाड़ में इसका एक और जगह उपयोग किया जाता है। पावों में मोच आ जाने पर भी उस जगह कंडाली की झपाक लगा कर उसे ठीक किया जाता है। 
यह पौधा मध्य हिमालय वाले क्षेत्रों एवम नेपाल आदि में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। उत्तराखंड में भी यह पौधा लगभग हर जगह मिल जाता है। हालांकि यह औषधि के रूप में भी उपयोग में लाया जाता है। यहां तक कि इसके पत्तियों को चाय बनाने में भी उपयोग में लाया जाता है। हाल ही में एक समाचार पढ़ रहा था, जिसमें यह लिखा था कि, कंडाली की पत्तियों की विदेशों में भारी मांग है। लगभग तीन सौ रुपए प्रति किलो इसका मूल्य बताया गया था। हालांकि हमारे पहाड में गढ़वाल क्षेत्र में इसे कंडाली और कुमाऊं क्षेत्र में  "सिसूंण" भी कहा जाता है। यह सूखने के बाद पशुओं के चारे के अलावा, साग बनाने के काम भी आता है। वैसे अब बहुत ही कम लोग होंगे, जो इसका साग बनाकर खाने में उपयोग करते होंगे। आम तौर पर लोग इसे बिच्छू घास के नाम से जानते हैं। हमारे पहाड़ की परंपराओं के हिसाब से यह पौधा और इससे जुड़े लाभ अनगिनत हैं ,लेकिन बढ़ते बदलते वैश्विक तापमान और मौसम में अनचाहे परिवर्तन का भी इस पौधे पर असर पड़ा है। पहले की भांति यह पौधा अब पहाड़ में थोड़ा कम होने लगा है । 
कंडाली के इन सब लाभों से हटकर यहां मैं इसके ऐसे लाभ का जिक्र कर रहा हूं, जिससे हम सब पहाड़ी लोग बचपन से वाकिफ हैं। मुझे आज भी याद है, बचपन में जब थोड़ा सा भी टेढ़ा - मेढा होते थे, तो यह कंडाली हमें तुरंत सीधी रेखा पर ले आती थी। पहाड़ों में आज भी हर घर में बच्चों को इस कंडाली के नाम से ही ब्लैकमैल किया जाता है। बच्चों में इसका इतना खौफ है कि मानो उनके लिए यह किसी खतरनाक दुश्मन से कम नहीं। और माता - पिता के लिए यह एक ऐसी राम - बाण औषधि , जिसका प्रयोग बच्चों पर करने से ,तुरन्त ही माता - पिता के मन मुताबिक़ परिणाम दिखने लग जाते हैं। मुझे कंडाली के इस पौधे से जुड़ी अपने बचपन के बहुत से किस्से आज भी अच्छे से याद हैं। मुझे आज भी याद है कि कैसे कंडाली के डर से हम तुरंत मम्मी का कहना मान लेते थे। कैसे कंडाली के डर से तुरन्त खेल बन्द कर घर में पहुंच जाते थे। कैसे कंडाली के डर से ना चाहते हुए भी तुरंत स्कूल का होमवर्क कर देते थे। आज भी याद है , कैसे कंडाली की एक झपाक लगने से उछल - कूद शुरू कर देते थे। और एक बार कंडाली गलती से लग भी गई तो कैसे इसके झनझनाहट को कम करने के लिए नुस्खे अपनाते थे। नुस्खे ऐसे कि जिनका जिक्र यहां नहीं कर सकता हूं। कंडाली का एक प्रयोग और भी है। बच्चों को घर - आंगन से बाहर जाने से रोकने के लिए भी पहाड़ों में कंडाली की बाढ या दीवार जैसी लगा दी जाती है। जो बच्चों के लिए मानों किसी लक्ष्मण रेखा से कम नहीं होती। बच्चे उस कंडाली की सीमा को चाह कर भी नहीं लांघ सकते, उनके मन में बैठा कंडाली का यह डर इतना भयानक होता है कि बच्चे इसके नजदीक आकर छूना तो दूर, इसके पास भी नहीं फटकते हैं। यहां तक कि हमारे पहाड़ में इसका उपयोग शराबी को पर भी किया जाता है। मुझे याद है , जब भी कोई शराबी गाली आदि देता था, तो कैसे प्रतिशोध के रूप में उसके मुंह पर इसकी झपाक लगाई जाती थी। हालांकि अब धीरे - धीरे कंडाली के साथ मिलकर किए जाने वाले ये नुस्खे कम हो चले हैं। मै देखता हूं, अब वो बचपन नहीं रहा, जब बच्चों को डराने के लिए माता - पिता को कंडाली की जरूरत पड़ती है। अब वो नटखट पहाड़ी बचपना भी नहीं रहा। अब बच्चे उम्र से पहले ही बड़े हो चले हैं। अब बच्चे स्मार्ट हो गए हैं। और घर पर ही रहकर स्मार्ट फोन चलाते हैं। अब समूह बनाकर बच्चे कम ही खेलते हैं,  उनके लिए मैदान अब मोबाइल फोन की स्क्रीन होती है। इसलिए सोचता हूं, अब बच्चे इस कंडाली की झपाक से जैसे अनभिज्ञ ही होंगे। उन्हें नहीं मालूम कि यह झपाक क्या होती है? उन्हें नहीं मालूम कि कंडाली लगने के बाद कैसी झनझनाहट होती है। उन्हें नहीं मालूम कि कंडाली को देखकर झरझारहट महसूस कैसे होती होगी। और एक हमारा बचपन था कि यह कंडाली का पौधा आज भी हमें पुरानी अनगिनत यादें दिला देता है। और मजे की बात ये कि इतने बड़े होने के बाद भी कंडाली की सिर्फ तस्वीर मात्र को देखकर ही कैसे शरीर में एक झरझराहट सी उत्पन्न हो जाती है। 

©® कुन्दन सिंह चौहान।

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