"दो जून की रोटी......"
फोटो साभार : इंटरनेट।
दिन भर चिलचिलाती गर्मी..
पसीने से नहाया हुआ,
बोझ से लदा हुआ,
जहन में बस,
भूखे पेट के लिए निवाला,
और घर परिवार से किया वादा,
बड़ी मुश्किल से जिनको नसीब होती है;
मेहनत की दो जून की रोटी।।
ना शिकायत परिस्थितियों से,
ना नाराजगी भाग्य विधाता से,
बस भरोसा है दबे कंधों पर,
और दिन भर थके - हारे जिस्म पर,
फिर अगली सुबह निकलते,
शाम की रोटी के इंतजाम में,
चाहत सिर्फ मेहनत की कमाई,
कभी नहीं रखता उम्मीद, उससे ज्यादा,
बस जहन में घर परिवार से किया वादा,
बड़ी मुश्किल से जिनको नसीब होती है;
मेहनत की दो जून की रोटी।।
माता - पिता के सहारे की संभाले आश,
पत्नी - बच्चों के सपनों का संजोए विश्वास,
तपिश सहता है,भाव निष्फल, निस्वार्थ,
निष्ठा, ईमानदारी और लगन,
यहीं वो गहने उसके,
जो कराते हैं उसे,
वैचारिक अमीरी का अहसास..
हर दिन थकता है, हारता है।
फिर खड़े उठने का रखता है माद्दा,
चुपके से सिसकियां ही सही, दर्द भी पी जाता है;
वो मेहनतकश है, रोने की इजाजत भी कहां?
बस जहन में घर परिवार से किया वादा,
बड़ी मुश्किल से जिनको नसीब होती है;
मेहनत की दो जून की रोटी।।
©®कुन्दन सिंह चौहान।
"दो जून की रोटी" शीर्षक की कविता दो जून को पढ़ने को मिले तो अलग ही भाव उत्पन्न होता है। आपकी आवाज में भी इसको सुनना चाहूंगा। कृपया कर इसका एक छोटा सा भाग पढ़कर भी ट्वीट करें। आप पढ़कर सुनाएंगे तो आपकी भावनाएं और भी निखरकर आएंगी। कविता काफी सुंदर लिखी है आपने, तिवाड़ी जी और आपकी कविताएं ब्लॉगर में पढ़कर मन कर रहा है कि अपना पुराना ब्लॉग दोबारा पब्लिक कर दूं। कैसा रहेगा?
जवाब देंहटाएंबहुत आभार भाई जी। बिल्कुल आवाज देने की भी कोशिश करूंगा। फिलहाल पढ़कर ही आंनद लीजिए। और पुनः ब्लॉगर पर आइए। आपका स्वागत है। आपकी कलम को भी पढ़ने का हमें अवसर मिलेगा।😊🙏
हटाएंबहुत बहुत आभार मैठाणी जी। आपका स्नेह यूं ही मिलता रहे।🙏😊
जवाब देंहटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंबहुत बढ़िया कुन्दन जी।
जवाब देंहटाएं-- पवन
आभार भाई जी
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