एसडीआरएफ : "अन्संग हीरोज ऑफ उत्तराखंड"
यूं तो हमारा उत्तराखंड वीर योद्धाओं के साहस एवम पराक्रम के लिए ही जाना जाता है। उत्तराखंड के जवानों का का देश की रक्षा में अतुलनीय योगदान को कोई भुला नहीं सकता। लेकिन उत्तराखंड जैसे राज्य जहां हर वर्ष भूस्खलन, बाढ़, बादल फटना आदि दैवीय आपदाएं एवम सड़क दुर्घटनाओं की सैकड़ों घटनाएं होती हैं, तब यदि किसी बल की सेवाओं को भुलाया नहीं जा सकता है, तो वह बल है - एसडीआरएफ (राज्य आपदा प्रतिवादन बल)।
उत्तराखंड में एनडीआरएफ की तर्ज पर ही एसडीआरएफ का गठन किया गया। जिसका उद्देश्य राज्य में प्राकृतिक हो या अप्राकृतिक सभी प्रकार की आपदाओं के दौरान तत्काल राहत एवम आपदा के दौरान बचाव कार्यों को त्वरित एवम प्रभावी तरीके से संपादित करना है। वर्ष 2013 के जून माह में हुई केदारनाथ त्रासदी को कौन भूल सकता है। उस दौरान पूरे देश की तीनों सेनाओं एवम राज्य की पुलिस ने राहत एवम बचाव अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस आपदा के समय ही राज्य स्तर पर एक ऐसे बल की आवश्यकता महसूस हुई, जो ऐसी आपदा के समय स्थिति से निपटने में सक्षम हो। इन बातों को ही दृष्टिगत रखते हुए अक्टूबर 2013 में राज्य सरकार ने एसडीआरएफ के गठन हेतु शासनादेश जारी कर दिया था। उसके बाद मार्च 2014 में यह बल अपने प्रारम्भिक स्वरूप में आया। शुरुआत में इसकी दो कम्पनियां का गठन हुआ था।
इस बल में राज्य की नागरिक पुलिस, पीएसी, फायर सर्विस एवम अन्य अनुषांगिक शाखाओं में योग्यता के आधार पर पुलिस कर्मियों को प्रतिनियुक्ति कर शामिल किया गया। आपदाओं एवम दुघर्टनाओं से निपटने के लिए जितना कठिन कार्य एसडीआरएफ को सौंपा गया, उससे कई कठिन इन जवानों को प्रशिक्षण दिया जाता है। देहरादून के जौली ग्रांट के समीप स्थित एसडीआरएफ के हेड क्वार्टर को स्थापित किया गया। एवं प्रारम्भ में इन जवानों को एनडीआरएफ प्रशिक्षण केंद्रों भटिंडा, पटना एवम गाजियाबाद कड़े प्रशिक्षण हेतु भेजा गया। वर्ष 2018 में ही केंद्र सरकार द्वारा देहरादून में देश के सर्वाधिक आधुनिक तकनीक से परिपूर्ण नए प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना की घोषणा की गई।
गठन के बाद से पिछले पांच वर्षों में एसडीआरएफ ने अपनी अलग पहचान बनाई है।चार धाम यात्रा , नंदा देवी यात्रा के अलावा आपदा प्रबन्धन, जंगलों में आग एवम बड़े हादसों में भी इस बल ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इतना ही नहीं उत्तराखंड एसडीआरएफ देश का पहल ऐसा पुलिस बल है, जिसने माउंट एवरेस्ट जैसी चोटी पर अपना परचम लहराया है। एसडीआरएफ आईजी संजय गुंजियाल जी का रेड एफएम के रेडियो जॉकी काव्य जी के साथ एक इंटरव्यू देख रहा था,उनके अनुसार माउंट एवरेस्ट को फतह करना उनके प्रशिक्षण के ही एक हिस्से कि तरह था। चूंकि राज्य की विषम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण हाई एल्टीट्यूड इलाकों में भी यह बल कार्य करता है, इसलिए एवरेस्ट फतह जैसी घटना इस बल के लिए सामान्य सी बात लगती है। इससे ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितने कड़े अभ्यास या यूं कहें अपनी जान को जोखिम में डालकर यह बल अपनी सेवाएं दे रहा है।
इतना ही नहीं उत्तराखंड की एसडीआरएफ को देश की सबसे तेज तर्रार राहत बल का तगमा भी हासिल है। नदियों एवम तेज बहाव में तलाश व बचाव कार्यों में भी राज्य एसडीआरएफ पारंगत है। एसडीआरएफ की फ्लड टीम की अन्य राज्य भी आपदा के समय सहायता लेते हैं। पिछले कुछ दिनों ही आंध्रप्रदेश के गोदावरी जिले में गोदावरी नदी में नाव पलटने से सैकड़ों लोग लापता हो गए थे, उस दौरान भी आंध्र सरकार ने उत्तराखंड एसडीआरएफ की सहायता ली थी, और हमारे इस बल ने उल्लेखनीय कार्य किया था।
अगस्त 2019 में उत्तरकशी - आराकोट में अाई भीषण आपदा में भी एसडीआरएफ की भूमिका को भुलाया नहीं जा सकता। इस आपदा के बाद राज्य एसडीआरएफ कमांडेंट तृप्ति भट्ट द्वारा जवानों को सम्मानित भी किया गया था। इसी आपदा में राज्य एसडीआरएफ का एक ऐसा मानवीय चेहर भी सामने आया जब बिहार के "शिवाजन" नाम के लापता मजदूर की जान बचाकर एसडीआरएफ जवान कुलदीप सिंह ने अपने व्यक्तिगत प्रयासों से उस मजदूर को 13 वर्षों बाद बिहार में उसके परिवार से मिलाया। एसडीआरएफ जवानों की निडरता, वीरता एवम साहस का एक और परिचय जवान राजेन्द्र नाथ ने दिया। जिन्होंने 18 दिन के कठिन अभियान में माउंट त्रिशूल पर पहुंचने में कामयाबी पाई।
राज्य से इस बल ने देश ही नहीं विदेशों में भी अपने साहसिक कार्यों का लोहा मनवाया है। सितम्बर 2018 में बद्रीनाथ के वासुधारा ट्रेक पर फंसे अमेरिकी नागरिक को इस बल द्वारा रेस्क्यू किया गया। इसकी तारीफ न केवल अमेरिकी दूतावास द्वारा मुख्यमंत्री को ट्वीट कर की, बल्कि अमेरिकी मीडिया द्वारा भी राज्य एसडीआरएफ की सराहना की गई।
गठन के बाद से ही हर साल यह बल नई - नई उपलब्धियां अपने नाम जोड़ रहा है। गठन के बाद से इस बल द्वारा लगभग 700 से अधिक अभियानों को चलाकर 6000 से अधिक लोगों की जान बचाई गई है।इसमें भूस्खलन, बाढ़,सड़क दुर्घटना,ट्रेकिंग आदि विपदाओं में फंसे लोग शामिल हैं। अपनी जान जोखिम में डालकर इस बल द्वारा आपदाओं में मारे गए 700 से अधिक शवों को भी उनके परिजनों तक पहुंचाने में मदद की गई है।
वर्तमान में जहां पूरा विश्व कोरोना महामारी से ग्रसित है। इस आपदा के समय भी राज्य एसडीआरएफ अपनी सेवाएं पूरी निष्ठा एवम समर्पण भाव से दे रहा है। अप्रैल माह में एसडीआरएफ द्वारा प्रयागराज में फंसे 75 छात्रों को उत्तराखंड लाया गया। उसके बाद राजस्थान के कोटा में फंसे छात्रों को भी इस बल द्वारा सकुशल अपने गृह राज्य लाया गया। मई माह में पंजाब के चंडीगढ़ 20 सदस्यीय एसडीआरएफ दल वहां फंसे राज्य के प्रवासियों को लेने गया। एवम 400 से अधिक प्रवासियों को उनके घर तक पहुंचाने में मदद की। इसी प्रकार अन्य राज्यों में भी एसडीआरएफ की टीम द्वारा वहां फंसे उत्तराखंडी लोगों को अपने राज्य में पहुंचाया गया।
संभावित आपदा से निपटने की तैयारियों के साथ - साथ यह बल आपदाओं से सम्बन्धित प्रशिक्षण एवम जागरूकता अभियान भी चलाता है। यह बल राज्य की अन्य संस्थाओं के साथ सामंजस्य स्थापित कर परस्पर सहयोग एवम पुनर्निमाण कार्यों में भी अपनी सेवाएं देता है। इन सब के बावजूद भी राज्य में बहुत कम लोग राज्य एसडीआरएफ के कार्यों एवम इनके अद्वितीय योगदान से वाकिफ हैं। ना ही यह बल कभी अपनी सेवाओं एवम राज्य के लोगों के लिए किए गए अपने कार्यों का खुद प्रसार करते हैं। सीमित संसाधनों के बाबजूद एसडीआरएफ के ये जवान हर आपदा के दौरान देवदूत बनकर अपनी जान की बाजी लगाकर आपदा में फंसे लोगों की जान बचाते हैं। आज राज्य के हर ऐसे विषम परिस्थितियों वाले क्षेत्रों में ये जवान तैनात हैं, जहां आपदा की ज्यादा संभावनाएं रहती हैं।
हर आपदा के दौरान उल्लेखनीय योगदान देकर राज्य के लोगों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता, निष्ठा एवम समर्पण को प्रदर्शित करते हुए राज्य के "अन्संग हीरोज" की तरह अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इनकी निपुणता का अंदाजा इस से भी लगाया जा सकता है कि उत्तराखंड का एसडीआरएफ देश के सबसे अग्रणी आपदा बलों में गिना जाता है। आज यह बल राज्य में किसी भी आपदा से निपटने में सक्षम बनता जा रहा है। उम्मीद है आने वाले भविष्य में और आधुनिक संसाधनों के साथ यह बल राज्य में घटित हर आपदा से निपटने में अधिक बेहतर तरीके से अपना योगदान देता रहेगा।
©® कुन्दन सिंह चौहान।
नमन है इन जवानों को, इनकी जांबाजी को सलाम हैं
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