जितनी सहज दिखती हैं, उतनी ही बनावटी भी हैं हमारी संवेदनाएं...!



केरल में गर्भवती हथिनी  की मौत या यूं कहें निर्मम हत्या के बाद जिस तरह से पूरे देश में भावनाओं का ज्वार सा बह रहा है। सोशल मीडिया आदि पर संवेदनाओं का अंबार सा लगा हुआ है। पूरा भारत इस घटना पर अपना दुःख अपने - अपने तरीके से व्यक्त कर रहा है। यह सब देखकर ऐसा महसूस हो रहा है मानो हम अचानक कितने पशु प्रेमी हो गए हैं। हथिनी की दर्दनाक मौत की निसंदेह जितनी निंदा हो सकती है , वह कम ही होगी। मगर सचमुच इस कुकृत्या को अंजाम देने वालों के खिलाफ हमारा यह आक्रोश मुझे अंदर से उतना ही खोखला लग रहा है, जितनी खोखली हमारी संवेदनाएं हैं। हमारे रचे - बुने हुए इस समाज में आखिर संवेदनाओं के लिए स्थान बचा ही कहां था? जो इस घटना के बाद से ही एक ऐसे बनावटी पशु प्रेमी होने का ढोंग रचा जा रहा है। ऐसा ढोंग जो सिर्फ और सिर्फ एक -दो दिनों तक फेसबुक और ट्विटर वॉल, वॉट्सएप स्टेटस आदि की शोभा बढ़ाने तक ही सीमित है। ऐसा इसलिए लिखने पर विवश हुआ हूं , क्यों कि हम इंसानों ने कहां ऐसी घटनाओं से सीख लेनी है? इंसानों और जानवरों के बीच कहां कोई खाई बची हुई है? वरन इंसान ही अब जानवरों से अधिक अबोध , असंवेदनशील , निर्बुद्ध हो चले हैं। क्या इससे क्रूर हमारा समाज आज इंसानों की हत्या नहीं करता? क्या इस गर्भवती हथिनी से निर्मम आज हमारा समाज स्त्रियों तक को उत्पीड़ित, यहां तक की मौत के घाट नहीं उतरता? जब इंसानों की परस्पर संवेदनाओं की मौत हो चुकी हो, फिर माफ़ कीजिए एक  पशु की मृत्यु पर यह निर्दयी समाज सचमुच इतना दुखी है, संदेह होता है। वर्ष 2016 में एक ऐसी ही घटना उत्तराखंड में भी हुई थी, जब एक प्रदर्शन के दौरान पुलिस के घोड़े "शक्तिमान"  को विधायक द्वारा घायल करने का मामला सामने आया था। घोड़े की टांग टूटी और एक महीने के बाद घोड़े की मौत भी ही गई थी। उस दौरान भी सारे देश के पशु प्रेमियों ने इस घटना पर ऐसे ही दुख जताया था। तब पशुओं पर क्रूरता के खिलाफ सख्त कानून बनाने की बहस भी जोरों पर थी। खुद केंद्रीय मंत्री रही मेनका गांधी ने तब कथित तौर पर दोषी विधायक को सजा देने की मांग भी की थी। विधायक को सजा भी हुई, लेकिन कुछ दिनों बाद जमानत भी हो गई थी। अचानक पशु प्रेमी बन बैठे समाज का आक्रोश भी तब तक ठंडा हो चुका था। और कुछ दिनों बाद इस घटना को ही भूल गए। हथिनी की मौत के बाद आज फिर से दोषियों के खिलाफ सजा की मांग उठी । मामले को तूल पकड़ता देख केरल सरकार के द्वारा भी अज्ञात के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी गई। दोषियों को सजा होगी या नहीं, इस विषय से हटकर आम होती इस प्रकार की घटनाएं हमें ज्यादा चिंतित करनी चाहिए।  ऐसा नहीं है कि देश में जानवरों पर और कोई भी अत्याचार नहीं होते हैं। ना जाने हर रोज कितने पशु - पक्षी हम इंसानों का शिकार होते होंगे। ना जाने कितने पशु ऐसे ही हर रोज अपनी जान गंवाते होंगे।  काश हर पशु - पक्षी की जान की हम ऐसे ही कीमत समझ पाते। एक सर्वे के मुताबिक प्रतिदिन दुनिया से लगभग सौ जानवरों की प्रजातियां खत्म होती हैं। इसका कारण भी सिर्फ हम मानव ही होते हैं, या तो हम उनके रहने के लिए जंगलों को ख़तम करते जाते हैं, या फिर तब तक उनका शिकार करते हैं, जब तक वे ख़तम नहीं हो जाते। काश हर बार हम ऐसे ही खुद को आक्रोशित दिखा पाते। काश मांस निर्यात में हमारे देश के अव्वल होने पर हमें शर्म महसूस हो पाती। वर्ष 2016-17 में ही सरकार ने संसद में बताया कि भारत में बीफ का निर्यात 17 हजार टन तक बढ़ गया है, क्या ऐसी खबरों को सुनकर हमारा मन कभी थोड़ा भी विचलित हुआ? उसी दौरान वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री रहीं निर्मला सीतारमण ने संसद में एक प्रश्न के जवाब में यह भी कहा था कि उनके मंत्रालय को मांस और चमड़े आदि के निर्यात अथवा उत्पादन को रोकने के लिए कभी भी कोई शिकायत प्राप्त नहीं हुई है। वास्तविकता तो यह है कि हम खुद ही पशु - पक्षियों को अपना आहार समझते हैं। हमारे समाज में लगभग हर दूसरा व्यक्ति मांसाहारी है। निर्दोष पशु - पक्षियों की निर्मम हत्या कर हम उन्हें खाते हैं। क्या तब हमारी संवेदनाएं मर जाती हैं? क्या अपने आहार के लिए जिन जानवरों को हम मारते हैं, वो बिना प्राणों के होते हैं? क्या हथिनी , घोड़े आदि की तरह ही उनका जीवन नहीं होता है? जहां कोई भी परिवार का सदस्य मांस ना खाता हो, शायद ही हमारे आस - पास कोई ऐसा परिवार होगा। फिर हमने ऐसा आक्रोश क्या उनके खिलाफ भी कभी जताया है? क्या संवेदनाओं को भी हमने सलेक्टिव बना दिया है? अपनी सोहलियत के गुणा - भाग के अनुसार ही क्या अब हम दुख जताएंगे? बहुत से सवाल जो मन को कचोड़ रहे हैं, और समाज से ही नहीं, पहले खुद से भी इन सवालों को पूछ रहा हूं। खुद मांसाहारी हूं। और हथिनी की हत्या पर दुख जताने, वेदनाएं व्यक्त करने की नैतिकता शायद पहले ही खो चुका हूं। पशु- पक्षियों की जान की कीमत को तौलने का पैमाना अलग - अलग नहीं हो सकता। हथिनी को मौत के घाट उतारने वाले जितने दोषी हैं, मांसाहारी समाज भी उतना ही दोषी है। आखिर इंसानों ने ही तो जानवरों की जान की कीमत तय की है। कीमत इतनी कि ग्राम और किलो ग्राम में पशु- पक्षियों के मांस को हम खरीदते - बेचते हैं। फिर हथिनी की मौत पर अधिकतर बहते आंसू घड़ियाली ही लगते हैं। उमड़ती भावनाएं बहुत हल्की सी लगती हैं। ज्यादातर लोगों के लिए यह घटना एक वायरल एपिसोड से ज्यादा कुछ भी नहीं है। आज दुख जताकर कल किसी पशु - पक्षी के मांस को चाव से खाइए। इंसानियत शब्द की विश्वनीयता भी तो इससे ज्यादा कुछ नहीं बची हुई है।  इंसानियत का ' ई ' अक्षर भी अगर बचा हुआ है तो समाज खामोश होकर खुद के कुकृत्यों पर आज पश्चाताप कर रहा होता। इतनी सहजता से बनावटी संवेदनाओं को धड़ल्ले से नहीं बेच रहा होता।

©® कुन्दन सिंह चौहान।

टिप्पणियाँ

  1. क्या संवेदनाओं को भी हमने सलेक्टिव बना दिया है? अपनी सोहलियत के गुणा - भाग के अनुसार ही क्या अब हम दुख जताएंगे? .....👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌

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  2. यहां फिर आप मुझसे बाज़ी मार गए। मैं बस इस बारे एक ट्वीट ही कर पाया कि " मांसाहारी हूं इसलिए हथिनी की मृत्यु पर इंसाफ मांगने का मुझे कोई हक नहीं"। आपकी सक्रियता से गौरवान्वित महसूस करता हूं कि मैं आप जैसे उत्कृष्ट लेखक और अच्छे व्यक्तित्व वाले व्यक्ति के संपर्क में हूं। आशा करता हूं कि आप ऐसा ही उत्कृष्ट कार्य करते रहें और आपका नाम हर जगह हो। आपके इस लेख से एक बात और समझ आ गई है मुझे कि, वक्त पर किया गया कार्य ही सही होता है इसलिए आज और अभी से अपना ब्लॉग पुनर्जीवित करता हूं। यह यूट्यूब वीडियो बनाने को कॉपीराइट और रॉयल्टी फ्री कंटेंट ख़ोजने में हफ्ता भर लग जाता है और तब कई कविताओं और लेखों का औचित्य नहीं रह जाता है। अगला कंटेंट अब वहीं से पोस्ट होगा, लिंक जल्द ही आपके साथ ट्विटर पर साझा करूंगा। धन्यवाद 🙏

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    1. बहुत आभार पुष्कर भाई। आपकी कविताएं भी बेहद सार्थक एवम सारगर्भित होती हैं। यूट्यूब के साथ साथ पुनः ब्लॉगर पर भी आइए। 😊🙏

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  3. Bahut sahi ,,, manav samaj sabse jyada andha ho chuka hai hr chij ko formal leta hai,,snvedna to reh hi nhi hui sahab,, ,achha lekh hai
    #Neelam

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  4. बेहतरीन��, लिखते रहा करो।

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  5. har sikke ke do pahloo hote hain mana ki sab dhong kr rahe mujhe bhi social media m comments likhne wale apni jhooti dikhawati savednaye vyakt karne wale bilkul pasand nahi par agr sab vegetarian ho gye to kya sabke liye food available ho payega balance bigad ayega ye bhi ek sochniya visay hai.

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    1. टिप्पणी के लिए आपका आभार। कॉमेंट के साथ अपना परिचय भी दे देते तो अच्छा रहता।😊🤗
      आपकी बात से सहमति जताते हुए मैंने भी आलेख में खुद इस बात को जोड़ कर लिखा है कि मै भी खुद मांसाहारी हूं।। आलेख की विषय वस्तु से ही स्पष्ट है, मेरा विरोध मांसाहार पर नहीं है। सिर्फ पहले से ही मरी पड़ी मानवीय संवेदनाओं का बनावटी रूप जो धड़ल्ले से बेचा जा रहा है, सिर्फ उस पर समालोचना की गई है।
      फिर भी टिप्पणी के लिए आभार।😊🙏❣️

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  6. फिर लोग कहते हैं कि इस क्रूरता को मांसाहार से ना जोड़े। क्यों ना जोड़े भाई? जब ये सीधी सीधी जुड़ी हुई है। जानवरों के प्रति संवेदना भी जतानी है और मांसाहार भी नहीं छोड़ना है। हद है! आप इसे लेकर ईमानदार तो हैं। शाकाहार एक सुंदर जीवन पद्धति है। कृपया इसे अपनाइए।
    बिल्कुल सही बात लिखी सर 🙏

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    1. टिपण्णी के लिए आपका आभार मैम। आपने सही कहा.. मांसाहार समाज के संवेदनाएं व्यक्त करने की नैतिकता समझ से परे है लगती है।🙏🙂

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