पापा! समझाओ ना शहादत की परिभाषा.....


लिपटा हुआ जब देखा तिरंगे से,
वीर पिता का फौलादी तन।
मासूम सी बिटिया निहारती ,
प्रश्न पूछती, पिता से मन ही मन।

पिता - वात्सल्य का,
अधिकार मुझे था।
इतनी जल्दी मुझसे छीना,
ये आतुरता किसने की?

देश प्रेम और माटी की रक्षा,
यहीं तुम्हारी थी प्रतिबद्धता,
फिर कौन तुम्हें ये लील गया?
 कायरता ये किसने की?

सपनों के, पापा पंख संवारेंगे,
ये जो थी मेरी अभिलाषा।
आसमां अब कैसे छूऊंगी?
दिलाओ पापा अब मुझे दिलासा।

चुप्पी ! ये कैसी चुप्पी है?
सन्नाटा मुझे ये अखर रहा है।
पापा तुमसे था जो संसार हमारा,
मानो सब कुछ बिखर रहा है।

राष्ट्र पूरा है गर्वित तुम पर,
अभिमान की है ये कौन सी भाषा?
अनभिज्ञ हूं, मैं नहीं जानती,
पापा समझाओ ना, शहादत की परिभाषा।

        ©®कुन्दन सिंह चौहान।

टिप्पणियाँ

  1. Beautifully captured emotion....kundan bhaiya ...keep writing...if words pierce d heart n pain its words only wh give solace

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  2. शानदार तरीके से शब्दों को सजाया है भाई

    जवाब देंहटाएं
  3. वाह। क्या खूबसूरत शब्द दिए हैं आपने इस मासूम सी बच्ची की भावनाओं को कुंदन जी। बहुत बेहतरीन।

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत ही बढ़िया कुंदन जी , सैलूट है ।
    🙏🌷🌷🌷

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  5. बहुत ही लाजवाब भाई।👌👍🙏😪🇮🇳

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत सुंदर और द्रवित कर देने वाली अभिव्यक्ति

    जवाब देंहटाएं
  7. बहुत ही बढ़िया कुंदन भुला।👍👍👍👍👍👍🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳

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  8. बहुत सुंदर सैलूड है क्या खुबसूरत लिखा है बड़े भाई

    जवाब देंहटाएं

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