शायद बूढ़ा हो चला था......
*शायद बूढ़ा हो चला था।*
ठोकरों से अब,
निडरता सी थी,
हर बार गिरता,
मगर फिर भी मुस्कुराहट।
दर्द भी अब,
शायद बूढ़ा हो चला था।
बादल घिरे थे,
था घना अंधेरा।
उम्मीद की टकटकी लगाए..
मगर रात भर,
था आसमां में देखता।
संयम भी अब,
शायद बूढ़ा हो चला था।
जय - पराजय की,
चिंता कहां थी?
फिसलती रही,
हर बार बाजी।
आखिरी छण तलक,
पर लड़ता रहा।
तजुर्बा भी अब,
शायद बूढ़ा हो चला था।
वयोवृद्ध सी ..
ना जाने,
क्यों दिख रही थीं राहें?
भ्रम भी तो अब,
शायद बूढ़ा हो चला था।
©® कुन्दन सिंह चौहान।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें