मै निहारता रहा...



एक रोज तड़के,
मै निहारने लगा ,
प्रकृति को।
ओंस की बूंदों को,
बिछोना बनाकर।
कोहरे की चादर,
ढकी हुई हो,
गले तक जैसे।
आधे खुले नयन,
और
शाम्भवी-मुद्रा में लीन,
दिख रही थी,
प्रकृति।

मै निहारता रहा... 
पंछियों का कलरव,
सुबह की गुंजन,
मानो गुनगुना रही थी,
प्रकृति के कानों में।
दूर बड़े बड़े,
वृक्षों के बीच,
स्वतः निर्मित,
रोशनदानों को,
चीरती हुई,
सूर्य की पहली किरण,
और उसकी अरुणिमा,
मानो जगा रही थी,
प्रकृति को।

मै निहारता रहा..
प्रकृति उठी,
और स्नेह दिखाकर
सूर्य की आभा ने,
ओंस के बिछोने,
और
कोहरे की चादर को,
समेट कर रख दिया हो,
मानो किसी अदृश्य कोने में।

मै निहारता रहा...
पलक झपकते ही,
शांत और सहमी सी,
प्रकृति का आवरण,
खिलखिला उठी जैसे।
सादगी भरी,
मगर आकर्षक 
सुबह के अलंकरण से,
मानो 
विभूषित हो गई थी,
प्रकृति।

©®कुन्दन सिंह चौहान



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