आखिर.. जीत पायेगा प्रकृति से..
आसमां भी,
कितना निष्ठुर होकर,
बरस रहा है।
जिधर नजर दौड़ रही है..
दरक रहे हैं पहाड़,
टूट रहीं हैं सड़के,
खिसक रही हैं पगडंडियां,
उफनती नदियां,
बहा ले जा रही हैं,
घरों को।
प्राकृतिक फिनोमिनन को,
ऋतु परिवर्तन के चक्र को
संघनन की प्रक्रिया को,
सब कुछ दरकिनार कर,
अपने कुकृत्यों के कारण,
हम बना चुके हैं इसे,
आफत की बारिश।
और भूल रहे हैं..
इस आफत का,
कौन है सूत्रधार?
किसने किया है,
मजबूत से पहाड़ों को कमजोर?
किसने छेड़ा है,
नदी - नालों और किनारों को?
मौसम के इस अप्रत्याशित परिवर्तन का,
कौन है जिम्मेदार?
हमने ही तो डाली हैं दरारें,
विकास के नाम पर।
हमने ही तो फोड़े हैं,
विस्फोटक..
निर्माण के नाम पर।
हमने ही तो बनाए हैं,
जंगल कंक्रीट के..
आधुनिकीकरण के नाम पर।
हमने ही तो हथियाए हैं,
नदी और नाले..
किनारों पर हमने ही तो,
बनाई है बड़ी - बड़ी इमारतें।
न्यौता हमने ही तो दिया है,
प्रकृति को..
कि आओ!
चलो टकराते हैं।
कौन किसे..
पहुंचा सकता है,
ज्यादा नुकसान..
आओ आजमाते हैं।
अब सहमा सा क्यों है इंसान,
डर किस बात का?
देख प्रकृति का विकराल रूप..
जितना लड़ सकता है,
उतना लड़।
वैसे भी होना ही है,
एक दिन दंभ चूर - चूर।
आखिर जीत पाया है,
कभी कोई प्रकृति से?
©® कुन्दन सिंह चौहान।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें