प्रकृति के निराले रंग....
दूर पहाड़ियों पर,
उमड़ते - घुमड़ते,
बादल।
उनकी ओट में,
छिपा - छिपा सा सूरज।
ठंडी सी हवाओं के झोकों
का अहसास।
एकाएक चारों तरफ,
पेड़ों पर लदी,
हरी - हरी पत्तियां।
खेतों में मखमल सी,
हरियाली।
बाड़े - सगोडों में,
मिर्ची, टमाटर,
बैंगन,भिंडी के,
उगे हुए छोटे से पौधे,
महसूस कर रहे हैं
अपना बचपन।
कितनी जल्दी,
हम पा चुके हैं,
आसमा सी छूती लंबाई।
इस खुशी में मानो,
लहलहाती - इठलाती
मुंगरी की लंबी सी पत्तियां।
पास ही पेड़ों और
ठंगरों की जड़ों से,
मानों दोस्ती का हाथ बढ़ाते,
और उनसे,
लिपटने को बेताब,
लौकी, कद्दू और ककड़ी के लगुले।
ये जेठ के अंतिम दिनों,
और आसमां और धरती के,
मिलन माह,
आषाढ के आने की,
आहट सी है।
जीवन दर्शन,
ढूंढिए प्रकृति के
इन निराले रंगो में।
सचमुच जेठ के बाद,
और सावन से पहले,
अल्हड़पन , लकड़पन,
संवरते - सजते,
यौवन का प्रतीक,
मानों आषाढ़ सी ही,
हम सब की जिंदगी है।
जो खींचता है,
बचपन और वृद्ध अवस्था के,
बीच की रेखा।
उकेरता है मानो,
हम सब की वास्तविकताओं को।
जहां तपना भी है,
और खिलना भी है।
तब जाकर कहीं,
बदलेगा जीवन
सौंण,भादो और असूज में।।
©®कुन्दन सिंह चौहान।
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