लम्फू... हमारे बचपन का साथी..
लम्फू.....
ना जाने..
कितनी स्मृतियां,
समेटे हुए है,
यह तस्वीर।
बचपन में..
कॉपी, किताब,
और पेन तो थी,
मगर मानो,
पहला स्तंभ यहीं था;
हमारे पढ़ाई तंत्र का।
जब बोझ सी,
लगती थीं किताबें;
माता - पिता का डर,
और बेचारा बचपन।
तब मजबूरीवश..
बैठते तो थे,
पढ़ाई के बहाने।
मगर पूरा वक्त जैसे,
इस लम्फू को निहारने,
इसके साथ खेलने,
बुझाने - जलाने में ही,
बीत जाता था।
कभी ऐसी शाम,
जब खबर लगती,
कि मिट्टी तेल नहीं है आज,
तब मानो,
खुशियों की सौगात ले आता था,
यहीं लम्फू।
और उन्मुक्त करा देता था,
जैसे बोझिल से बचपन को।
बड़े बुजुर्गों की,
नजरों से बचकर..
ना जाने, अनेकों बार,
सिर के बाल,
और आंखों के भौं..
जलाने के भी,
स्मृतियां महफूज हैं,
मानो,
इस लम्फू के साथ।
कभी इसकी,
बाती निकलने पर..
झट से उसे ठीक करने के,
हुनर ने,
हम में से, शायद कितनों को,
बनाया दिया होगा,
बचपन मे घर का..
सबसे होनहार बेटा।
कभी जानबूझ कर,
इसकी बाती को,
नीचे खिसका कर,
खराब हो जाने के बहाने ने भी,
कॉपी, किताबों से दूर,
सुकून भरी,
ना जाने..
कितनी नटखट रातों को,
हमें जैसे तोहफों में दिया होगा।
फिर अंत में,
भूले नहीं भुलाई जा सकतीं,
परीक्षाओं के दिनों की,
वो जागती रातें।
तब मानो यहीं लम्फू ,
जागता रहता था..
सारी - सारी रात,
हमारे साथ।
आज घरों से,
खो सा गया है..
मानों बचपन का हमारा यह साथी।
और तस्वीरों में ही जैसे,
कैद सी हो गई है..
इस लम्फू से हमारी,
बचपन की स्मृतियां।
©®कुन्दन सिंह चौहान।
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