पर्यावरण दिवस.....
बेतरतीब विकास के नाम पर,
कितना विनाश किया है हमनें।
आधुनिकीकरण की अंधी दौड़ में,
अंधाधुंध काटे हैं हमने जंगल।
बलपूर्वक रोकी हैं हमनें धाराएं,
शांत बहती, निर्मल नदियों की।
चिंतन कीजिए..
प्रकृति को,
कितना चिढ़ाया है हमने?
तोड़े - फोड़े हैं हमने मजबूत पहाड़,
चीरते आ रहे हैं वक्ष धरती का,
कर चुके हैं, छत - विछत..
प्रकृति की देह को।
सोचिए..
जल, जंगल और जमीन को,
कितना चिढ़ाया है हमने?
दम घुट गया है अब,
प्रकृति का भी।
कब तक सहेगी आखिर..
कितने प्रबोधन दिए प्रकृति ने,
कि हम सुधर जाएं,
रोक दें अपने कुकृत्यों को।
मगर दंभी मानव,
मार चुका है..
प्रकृति के प्रति,
अपनी संवेदनाओं को।
अब इंसान चाहे तो,
हर दिन मना ले तू,
पर्यावरण दिवस।
मगर प्रकृति के प्रति
मृत संवेदनाओं का भुगतान,
सूद सहित भुगतने को,
तू तैयार रह।।
©®कुन्दन सिंह चौहान
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