जिंदगी की पगडंडियां और चौड़े रास्ते.....

जिन्दगी की पगडंडिया और चौड़े रास्ते...


 पतली और संकरी पगडंडियों से निकले थे, कितने मस्तमौला थे तब, उछलते कूदते पता ही नही चला कब जिंदगी के राष्ट्रीय राजमार्ग पर पहुंच गए। और पहुंचते ही इतनी खुशी की लगा मानो यही असली जिंदगी है, इस बात से बेखबर कि यह तो बस सीधी शुरुवात है, अभी न जाने कितने मोड़ आएंगे! कितने चौराहे आयेंगे! सुकून था , संकरे रास्तों और पगडंडियों से चले पांव धीरे धीरे चौड़ी सड़क पर चलने के लिए अभ्यस्त हो रहे थे। इस चकाचौंध में इतना खो गए, घुल – मिल गए कि लगने लगा बस यही कही पास ही वो मंजिल है, जिसके लिए संकरे रास्तों से चले थे।
चलते रहे, चलते रहे, बस चलते रहे। छोटे – छोटे मोड़, दुराहे ये सब पार करना जैसे खेल – खेल की बात थी। अब भी असली चौराहा आना बाकी था , जो शायद विरले लोगों के ही जीवन में आता होगा। अब कुछ दूरी से भांप लिया था, कि चौराहा आने वाला है एक। ऐसा चौराहा जो न सिर्फ असमंजस में डालने वाला था, बल्कि आगे की सही राह के प्रति आशंकित भी कर रहा था।
खैर पांवों के छाले भी अब साथ देने लगे थे, उनका दर्द अब महसूस ही नही हो रहा था। और अंदर से दृढ़ भी बना रहा था, कि चौराहा कैसा भी हो ,जिस और पांव चल देंगे फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखना है।
चौराहे पर पहुंचे, जिंदगी का ये कैसा चौराहा था?
चारों रास्ते एक से, दूर तक सब कुछ धुंधला – धुंधला सा दिख रहा था। थोड़ा रुक सोचा जाए, कि किस ओर चलना है , जिंदगी ने इतनी भी फुरसत कहां दी थी? बस आंखे बन्द की, और अपनी जगह पर ही 360 डिग्री घुमा जैसे, फिर चल दिए पांव किसी एक रास्ते पर। चलते चलते आंखे खोलकर देखने को आतुर भी और आशंकित भी। कि सही सड़क पर तो आया हूं ना? कहीं चौराहे से दूसरा पता तो नही था जिंदगी का? बस किसी तरह हिम्मत जुटाई जैसे, और आंखे खोल दी। और देखा तो एक बड़ा सा मोड़ है, ऐसा मोड़ जिसको पार पाना भी सबके बस का नही है।
सोचा शायद कोई होता मेरी जगह तो नही करता ऐसी जिद्द। वापिस आ जाता फिर चौराहे पर , चौराहे से चौड़ी सड़क और फिर पगडंडियों के सुकून को जी लेता दुबारा।
मगर ये मोड़ जितना घुमावदार है, आगे –आगे उतना ही मजेदार भी है। जिद्दी पांव इसे पार पाकर ही लौटना चाहते हैं सुकून की पगडंडियों पर। 
संकरी होकर भी कितनी आसान होती है ना जिंदगी की पगडंडियां और जिन्दगी के चौड़े रास्ते उतने ही कठिन।

 ©® कुन्दन सिंह चौहान। ✍️

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