जीवन का बसंत अनिश्चित...


बसंत में खिलखिलाते ,
पुष्पों की रौनक देख..
भंवरे भी अनायास ही झूम उठते हैं।
मंडराते हैं सुबह –शाम,
और 
जीवन भर की दौलत उनकी..
बड़े चाव से लूटते हैं।

पुष्प बेचारा..
सुगंध है, खुबसूरती है..
मगर असहाय बना बैठा है।
पूछता है प्रश्न मानो वो,
कि..
ऐसी भी क्या लाचारी है?

महज कुछ ही दिन हैं,
जो शेष बचे हैं..
भंवरों को भी चेताता है।
आखिर कब तक मैं खिला रहूंगा?
कब तक तुम मंडराओगे?
जीवन का बसंत अनिश्चित,
निश्चित है बस झड़ने का दिन।

– कुन्दन चौहान |  कुन्दनकृति

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