चांद भी हर रोज जगाता रहा...



जिंदगी भर..
शराफत की 
दुकान चलाता रहा।

खरीददार 
कांटों के थे..
मैं फूल सजाता रहा।

दूरियां चाहते थे..
सफर में जो लोग,
नजदीकियां उन्हीं से 
मैं बनाता रहा।

हर आसान खेल...
जो जीतने थे मुझे,
उनको भी तस्सली से
मै हारता रहा।

यूं तो सूरज ही
जगाता है हर रोज मगर..
चांद भी हर रात,
मुझे जगाता रहा।
❤️🌸

– कुन्दन चौहान |  कुन्दनकृति

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