मौन...


भावनाएं,
जिनका गला घोटा जा रहा था रोज।
एक रोज दम तोड़ गईं,
और फिर निकला जनाजा।

शब्दों की भीड़ उमड़ी,
कांधा देने के लिए धक्मधक्का।
मगर संवेदनाओं के होंठ,
सिले हुए थे हर शब्द के।

अंतिम यात्रा बढ़ते जा रही थी,
फिर आ गई एक त्रिवेणी,
जहां संगम था,
बेबसी, मजबूरी और अभागी नदियों का।

लकड़ियां इकट्ठा की गई,
समझौते के पेड़ की,
सब तैयारियां पूरी थी,
चिता पर रख दी गई भावनाएं,

मगर मुखाग्नि कौन देगा?
कौन अपना है इन भावनाओं का यहां?
शब्द तांक रहे थे मौन की ओर,
और मौन फिर से करने लगा,
भावनाओं का दाह संस्कार।

 – कुन्दन चौहान  |  कुन्दनकृति

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