भीगे सपने..
जिन्हें कमीज के ऊपर वाली जेब में
रखकर मैं चलता था
कभी धूप से बचाता
तो कभी ठंड से
ठिठुरे ना ये सपने
इसलिए बाहर से स्वेटर पहन लेता था
अपना ख्याल नही रहता
बस इन सपनों का ख्याल रखता था
कि इन्हे ठंड या गर्मी न लगे
अचानक बेमौसम बरसात हुई
जब तक इन्हे बचा पता
भीग कर गिले हो चुके थे ये सपने
दौड़कर घर आया
मगर
तब तक रात हो चुकी थी
अब सुबह होने की प्रतीक्षा है
सूरज निकलेगा
तब इन भीगे सपनों को सुखा पाऊंगा।
– कुन्दन कृति
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